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जैफ बेजॉस वह इंसान जिसने कभी हार नहीं मानी

वह इंसान जिसने कभी हार नहीं मानी

अमेजॉन कंपनी के मालिक जैफ बेजॉस का जीवन संघर्ष

जैफ बेजॉस एक बहुत ही कामयाब उद्यमी है तथा उन्हें ई-कॉमर्स उद्यम का निर्माता कहा जाता है ऐमेज़ॉन विश्व की सबसे बड़ी रिटेलर कंपनी है जिसके द्वारा इंटरनेट पर सभी प्रकार के बिजनेस किए जा सकते हैं चाहे वह बिजनेस किसी भी वस्तु से ताल्लुक रखते हैं एक छोटी सुई से लेकर बड़े ट्रक तक अमेजॉन कंपनी सबको अपने साथ काम करने का अवसर प्रदान करती है.

जैफ बेजॉस का असली नाम जेफ्री प्रेस्टन है, उनका जन्म जनवरी साल 1964 में मेक्सिको में हुआ उनकी माता का नाम जैकलिन तथा पिता का नाम जोर गेनसेन है, जैफ बेजॉस की माता जी की शादी बहुत ही कम उम्र में हो गई थी जिसके कारण उनकी शादीशुदा जिंदगी ज्यादा दिन नहीं चल पाई और उनका तलाक हो गया और उनके पिताजी ने दूसरी औरत से शादी कर ली पिताजी की दूसरी शादी करने के बाद वह सब टैक्सेस में जाकर बस गए।

ने अपना स्कूल रिवर ऑफ एलिमेंट्री स्कूल और बाद में मियामी पॉमैटो सीनियर हाई स्कूल से किया वह जब स्कूल में पढ़ाई करते थे तब उन्होंने स्टूडेंट साइंस ट्रेनिंग ज्वाइन की यूनिवर्सिटी फ्लोरिडा में तथा जैफ बेजॉस साल 1982 में ग्रेजुएट हुए।

जैफ बेजॉस की रुचियां

बहुत ही कम उम्र में जैफ बेजॉस ने मैकेनिकल वर्क में अपनी रुचि बनाई और उन्हें अपने बचपन से ही चीजों को तोड़ मरोड़ कर जोड़ने में बहुत ही आनंद आता वह अपने खिलौनों को तोड़कर उसके बाद पेचकस से उन्हें जोड़ा करते थे।

जैफ बेजॉस ने अपने कमरे के भीतर ही अपनी छोटी सी उम्र में ही एक बिजली से चलने वाला अलार्म बनाया तथा वह तरह-तरह के ज्ञान कार्यकलापों को अपने गैराज में आजमाती रहते थे उन्होंने अपने हाई स्कूल से ही अपना पहला बिजनेस शुरू कर दिया था जिसका नाम था ड्रीम इंस्टिट्यूट यह बिजनेस युवाओं को विकास की ओर अग्रसर करने के लिए तथा उनकी सोच को बदलने के लिए खोला गया था जैफ बेजॉस के द्वारा।

साल 1982 में जब उसने प्रिंसटन विश्वविद्यालय में दाखिला लिया और वहां पर पड़ने की सूची लेकिन कुछ समय बाद ही उन्होंने अपने विचार बदल कर तथा उस विश्वविद्यालय में कुछ दिन अपना जीवन बिता कर वापस वह अपने कंप्यूटर और अपने विज्ञान क्रियाकलापों की ओर लौट आए तथा उन्होंने अपनी गर्मियों की छुट्टी में नॉर्वे में एक जॉब भी करी, जॉब करने के दौरान जैफ बेजॉस स्पेस क्लब के प्रेसिडेंट भी नियुक्त किए गए साल था 1984, तथा 1986 तक उन्होंने अपनी दो स्नातक की डिग्री समाप्त कर ली थी।

पढ़ाई खत्म करने के बाद

जब जैफ बेजॉस ने अपनी स्नातक की डिग्रियां प्राप्त कर ली तब उन्होंने रिटेल कंपनी को ज्वाइन किया तथा उसके बाद डी ई शो और co.in कंपनी जो कि न्यूयॉर्क में स्थिति जैफ बेजॉस ने उसे भी ज्वाइन किया और वहां पर कुछ वक्त अपना समय बिताया।

साल 1990 जैफ बेजॉस ने बहुत ही अधिक सफर तय किया न्यूयॉर्क और लंदन के बीच तथा वह बहुत ही कम उम्र में वाइस प्रेसिडेंट बने कंपनी के जब वह डी ई शॉ कंपनी में काम कर रहे थे तब उन्हें विचार आया कि मैं भी इस मौके का फायदा उठाकर अपना उद्योग शुरू कर सकता हूं तथा किसी भी वस्तु को बेच सकता हूं।

अमेजॉन कंपनी का निर्माण

साल 1995 में जब वे जो उसने Amazon.com एक ऑनलाइन पुस्तकों का उद्योग शुरू किया उन्होंने अपनी पहली किताब जुलाई 1995 में बेची तथा जब उन्होंने अपनी कंपनी को शुरू किया तब वह अकेले ही सब कार्य किया करते थे ऑर्डर आने पर वह आर्डर को खुद ही पैक करके खुद ही कस्टमर तक ऑर्डर को पहुंचा कर आते थे।

साल 1997 में जैफ बेजॉस ने अपनी कंपनी जब जनता के बीच लाई तब उन्होंने अपने कस्टमर से किसी भी प्रकार का टैक्स नहीं वसूला और ना ही सरकार को टैक्स दिया जिससे उनकी आमदनी बहुत ही अत्यधिक बढ़ती जा रही थी और वह एक सफल उद्यमी बनते जा रहे थे, अमेजॉन कंपनी बहुत ही सफलता पा चुकी थी तथा की पुस्तक की कंपनियों को पीछे छोड़ चुकी थी क्योंकि उन्होंने अपनी वेबसाइट को इस प्रकार बनाया कि वह 24 घंटे चलती रहे तथा कस्टमर ओ को आकर्षित करने के लिए उन्होंने कई प्रकार के डिस्काउंट भी दिए।

साल 1998 के आते आते उन्होंने अपनी कंपनी को बहुत ही विशाल रूप से विकसित कर लिया था अब उन्होंने अपनी कंपनियों को पुस्तक के अलावा भी आगे बढ़ाने की सोची थी तथा उन्होंने पुस्तक का कार्य करते-करते अपने अमेजॉन कंपनी को एक पहचान दी, वह पहचान थी: विश्व की सबसे विशाल पुस्तकों का संग्रह।

साल 2002 आते-आते जैफ बेजॉस ने अपनी अमेजॉन कंपनी के अंदर कई प्रकार की वस्तुओं को जोड़ दिया था तथा उनकी बिक्री भी चालू कर दी थी उनमें जैसे कि गाने की सीढ़ियां तथा वीडियो की सीढ़ियां अन्य प्रकार की चीजें अपनी कंपनी में जोड़कर उन सब का भी उद्योग चालू कर दिया था उसी के बाद उन्होंने अगला कदम कपड़ों की ओर बढ़ाया अपनी कंपनी में। साल 1999 में उन्होंने बहुत से ऑनलाइन स्टोर में अपना पैसा लगाया तथा अपनी कंपनी को ऐसी पहली कंपनी बनाया जो एक क्लिक सिस्टम पर कोई भी कस्टमर उनकी वेबसाइट पर आकर आर्डर कर सकता था जो कि लोगों को बहुत पसंद आया तथा सरल तरीका माना गया।

साल 2002 मैं अमेजॉन कंपनी ने अपना लोगो बदल लिया तथा एक स्माइल और उसके नीचे एक एरोपाइंट कर दिया तथा अपनी कंपनी को ए से लेकर जेड तक विस्तार कर दिया कि आप किसी भी अल्फाबेट का शब्द डालकर कुछ भी आर्डर कर सकते हैं।

अमेजॉन प्राइम

साल 2005 में जैफ बेजॉस ने अमेजॉन प्राइम का निर्माण किया जिसके अंदर उन्होंने जो कोई व्यक्ति अपना ऑर्डर ऑनलाइन बुक करता है उसमें से उन्होंने जो डिलीवरी चार्ज एकदम समाप्त कर दिया था जो कि लोगों के बीच बहुत ही कामयाब रहा तथा जब उस में सफल रहे।

जैफ बेजॉस ने 2005 के अंदर ही टिंडल का निर्माण किया किंडल एक ऑनलाइन क्रॉनिक किताब होती है जिसको आप अपने फोन पर ही पढ़ सकते हैं। साल 2010 में उन्होंने वाइली एजेंसी के साथ समझौता किया कि लेखक और ऐमेज़ॉन कंपनी दोनों किंडल में भागीदारी करेंगे।

जब बेजॉस जवान थे उन्होंने अपने साइंस स्टेशन में एक स्पीच दी थी वह स्पीच थी कि वह इंसान को ब्रह्मांड में भेजने की बात किया करते थे जब वह कामयाब हो गए तो उन्होंने एक कंपनी का निर्माण किया साल 2002 में उस कंपनी को नाम दिया गया एयरोस्पेस तथा ब्लू ओरिगिन जिसका लक्ष्य था कि ब्रह्मांड से लेकर पृथ्वी तक पब्लिक को यात्रा करवाना।

अपनी सफलताओं को लेकर जैफ बेजॉस को कई प्रकार के सम्मानित पुरस्कार भी मिले उन्हें साइंस और टेक्नोलॉजी की तरफ से भी सम्मानित किया गया साल 2008 में तथा 2012 में अमेजॉन कंपनी का नाम विश्व की सबसे बड़ी रिटेल कंपनी ऑफ द ईयर में शामिल किया गया तथा गोल्ड मेडल से सम्मानित किया गया ।

जैफ बेजॉस का निजी जीवन

जैफ बेजॉस ने शादी की साल 1993 में मैकेंजी टर्टल से लेकिन यह शादी कुछ साल ही चल पाई साल 2019 में उनका तलाक हो गया तथा उनके चार बच्चे भी है. उन्होंने अपने तलाक का कोई ठोस कारण मीडिया के सामने नहीं बताया तथा वह अपनी पत्नी को अपनी अमेजॉन कंपनी का कुछ परसेंट हिस्सा भी देते हैं.

हिन्दू धर्म के खात्मे पर ज्योतिबा फूले के विचार

हिंदू धर्म वास्तव में ही जीने लायक था या नहीं ज्योतिबा फुले के विचार सुनिए।

ज्योतिबा फूले एक बहुत ही सरल तथा सुलझे हुए इंसान थे ईश्वर को ही उन्होंने इस समाज तथा ब्रम्हांड का निर्माता माना और पृथ्वी पर सभी जीव जंतु नर नारियों तथा सभी को उन्होंने ईश्वर की ही संतान माना. ज्योतिबा फूले जितने सरल इंसान थे उतने ही वह ज्ञानी भी थे उन्होंने सदैव मूर्ति पूजा तपस्या भाग्यवान तथा अवतारवाद को हमेशा ही अपने विचारों से उनका खंडन किया.  उन्होंने भगवान तथा उपासक के बीच कोई मध्यस्थता आवश्यक नहीं मानी, जो भी पुस्तकें ईश्वर को विस्तारित तथा सुलझाने का दावा करती थी ज्योतिबा फूले ने उनका हमेशा ही तिरस्कार किया उनका मानना था कि ईश्वर को हम किसी पुस्तक,मूर्ति,पूजा तपस्या,इन सब क्रिया कर्मों के द्वारा ईश्वर को नहीं समझा जा सकता.

एमजी रानाडे और ज्योतिबा फुले के विचार

ज्योतिबा फुले का जो हिंदू धर्म के प्रति तथा नजरिया था वह बिल्कुल एमजी रानाडे के विचारों तथा विचारधारा से संबंध रखता था, लेकिन बहुत सी जगह उन दोनों के विचार अलग-अलग भी परंपराओं में वर्ग तो करते थे और उनसे अलग होने के बाद उन्होंने अपने मन में कभी नहीं बनाई. सुधारवादी कार्यकर्ताओं को वह संत विद्रोह तथा इतिहास में हुए उन जैसे प्रयासों की ही निरंतरता में देखते थे तथा फूले हिंदू धर्म को हमेशा सत्यशोधक समाज के एक विकल्प में देखा करते थे उनकी धारणाओं से एक सच्चा हिंदू धर्म परंपराओं से बिल्कुल ही अलग हुआ करता था.

हिंदू धर्म और ज्योतिबा फूले की विचारधारा

ज्योतिबा हमेशा ही हिंदू धर्म को एक अलग नजरिए से देखा करते थे तथा हिंदू धर्म को सबसे पवित्र बताया करते थे लेकिन उसके साथ साथ ज्योतिबा हिंदू धर्म के अंतर्गत मित्र को तथा पवित्र ग्रंथों मनुस्मृति और जो वेद ब्राह्मणों द्वारा विस्थापित किए गए थे ज्योतिबा उनका पूरी तरह खंडन करते थे और इनकी आलोचना भी करते थे

ज्योतिबा फूले सदैव ब्राह्मणवाद विचारधारा के खिलाफ थे तथा वह साबित भी करना चाहते थे कि ब्राह्मणवाद विचारधारा हिंदू धर्म को एक अलग किसम का नजरिया देती है उनका मानना था कि अगर ब्राह्मणवाद को हिंदू धर्म से अलग कर दिया जाए तो हिंदू धर्म से शुद्ध पवित्र सुंदर धर्म और किसी संसार में नहीं पाया जाता

ज्योतिबा फूले ब्राह्मणवाद के खिलाफ नहीं थे लेकिन वह उनकी आलोचना इसलिए किया करते थे क्योंकि हिंदू धर्म के अंदर दशकों से ब्राह्मणवाद को सम्मिलित करके हिंदू धर्म को बिल्कुल विलुप्त कर दिया गया था जिसकी वजह से ब्राह्मण वादों की विचारधारा हिंदू धर्म में सम्मिलित करके हिंदू धर्म को पेश किया गया तथा ब्राह्मणवाद होने के कारण ही वर्ग भेद जातिवाद सूत्र तथा इस प्रकार की समस्याएं भारतवर्ष में पैदा होती चली गई, ऐसा नहीं था कि ज्योतिबा फुले ब्राह्मण समाज के खिलाफ थे लेकिन वह उनकी आलोचना तो करते थे पर उनके अनुसार उनका मानना था कि जो ब्राह्मणवाद की विचारधाराएं सदियों से चली आ रही हैं उनको अब त्याग कर एक नई रहा पर चला जाए जो समाज को विकास की ओर अग्रसर करेंगी तथा लोगों की जीवन शैली को बेहतर बनाएंगे

फूले ने सदैव यह सिद्ध करने का प्रयास किया की हिंदू धर्म का इतिहास वास्तव में ब्राह्मणवाद वर्चस्व एवं सूत्र दासता का इतिहास है तथाकथित पवित्र पौधों में वह सच्ची धर्म चर्चा के बजाय कुटिलता शुद्धता और छद्म ही देखते थे।

अभिजात सुधारको और ज्योतिबा फूले

अभिजात सुधारकों ने सदैव हिंदू धर्म के समकालीन स्वरूप की ही आलोचना की लेकिन ज्योतिबा फुले ने उसके मूल पर प्रहार किया और इस बात किया की ब्राह्मणों ने समूचे इतिहास कर्म में निचली जातियों का अत्यधिक शोषण किया है और उनको छला है. ओले की व्याख्या के अनुसार हिंदू धर्म कुटिल ब्राह्मणों द्वारा निचली जातियों के शोषण करने के लिए एक ऐसी पद्धति रची गई जिसे वर्ण और जाति व्यवस्था पर आधारित एक धर्म था. 

ज्योतिबा फुले के अनुसार ब्राह्मणों समाज पर बहुत ही कुटल इरादों का आरोप लगाया फुले ने प्रार्थना समाज और ब्राह्मण समाज इन दोनों पर ही आरोप लगाया कि यह समाज निचली जातियों द्वारा जमा किए गए राजस्व तथा निचली जातियों के द्वारा की गई मेहनत संघर्ष से जो राजस्व इकट्ठा किया गया था प्राचीन इतिहास में ब्राह्मणों ने उस राजस्व के माध्यम से अपने समाज को उच्च दर्जे का स्थान देकर उसी प्रकार शिक्षित बनाया और निचले समाज जो ब्राह्मण के अनुसार बनाए गए थे उन्हें सदैव अपनी सेवा के लिए अपने नीचे ही बनाए रखा तथा उनके साथ छल किया.

ज्योतिबा फुले का यह भी मानना था कि ब्राह्मण संगठनों ने अपनी आत्मरक्षा के लिए और शुद्र का इस्तेमाल करने के लिए एक ऐसी सामाजिक अधिरचना तथा विचार निर्माण किया जिससे समाज में वर्ग भेद, जातिवाद, शूद्र जैसी विचारधाराओं का निर्माण हुआ तथा ब्राह्मण को सदैव ऊंचे स्तर का माना गया तथा ब्राह्मणों ने इन संगठनों के क्रियाकलापों का उद्देश्य था कि अपने राजनीति प्रेरित पूर्वजों द्वारा धर्म के नाम पर बनाई गई ऐसी अधिरचना को सदैव के लिए छुपा देना.

हिंदू धर्म और हिंदुत्व को ज्योतिबा ने क्यों खारिज किया

ज्योतिबा फुले ने हिंदुत्व तथा हिंदू धर्म को पूरी तरह खंडन कर अपने यहां बात रखी कि समाज के अंदर स्वतंत्रता और समानता का भाव होना चाहिए तथा सिद्धांतों पर आधारित सार्वभौम धर्म की प्रतिष्ठा का प्रयास उन्होंने सदैव किया. उनका सत्यशोधक समाज किसी गुरु अथवा ग्रंथ की सहायता के बिना सत्य की वास्तविकता पर बल देता था

ज्योतिबा के धार्मिक विचार निश्चय ही ईसाई धर्म से बहुत अधिक प्रभावित थे लेकिन उन्होंने धर्मांतरण का समर्थन कदापि नहीं किया क्योंकि उन पर पेन के उग्र धार्मिकता वादी तर्कों का प्रभाव भी अत्यधिक था जिसने इसाई धर्म की अनेकानेक त्रुटियों को भी लक्षित किया था.

उनका सार्वभौम धर्म उदारतावादी और अनेक ग्रंथो से पारंपरिक धर्मों से बिल्कुल अलग था उनके धार्मिक सरोवर मुख्यत तथा प्राथमिक रूप से सेक्यूलर विषय से जुड़ते थे सेक्यूलर शब्द से अभिप्राय है कि समाज में समानता तथा स्वतंत्रता कायम करना.

फुले की परिकल्पना में एक ऐसा परिवार गठित होना चाहिए जिसके प्रत्येक सदस्य अपने-अपने धर्म कर सकेंगे इस आदर्श परिवार के अंतर्गत पत्नी बौद्ध धर्म अपना सकती है जबकि पति ईसाई धर्म को भी अपना सकता है और बच्चे अन्य धर्म का अनुसरण कर सकेंगे फूले को विश्वास था कि सभी धार्मिक रचनाओं और ग्रंथों में सत्य का अंश हमेशा ही होना चाहिए.

ज्योतिबा फुले ने उनमें से कोई एक परम सत्य का दावा नहीं कर सकता उनका विचार था कि सरकार को हिंदू धर्म की अमानुष एक प्रथा और अन्याय पूर्ण परंपराओं की ओर आंख नहीं मूंद लेनी चाहिए तथा सरकार द्वारा ऐसी परंपराओं का पूर्ण रूप से खंडन करना चाहिए तथा कानूनी रूप से इसे अवैध मानना चाहिए।

ज्योतिबा ने सरकार की आलोचना कुछ इस प्रकार से भी की गई सरकार द्वारा मंदिरों को अनुदान जारी रखने पर भी ज्योतिबा फुले ने इस पर सवाल उठाए और इसकी आलोचना की क्योंकि यह धनराशि जो मंदिरों से जुटाई जाती है पुरानी हिंदू परंपराओं से कम ब्राह्मण वाद विचारधाराओं से ज्यादा जुटाए गए धन राशि करो के रूप में ही निचली जातियों से उगाई जाती है.

अनुसूचित जातियां तथा जनजातियां की संवैधानिक परिभाषा

अनूचित जनजाति क्या होती है  ?

आमतौर पर जाति की कोई परिभाषा विस्तार से कहीं पर भी निश्चित नहीं की गई है कि जाति या जनजाति की कोई ऐसी परिभाषा नहीं है क्योंकि भारतवर्ष अनेक प्रकार की भाषा ,जाति ,संस्कृति, धर्म ,क्षेत्रीय, विविधताओं से भरा एक विशाल देश है।

किसी भी जनजाति को इस आधार पर परिभाषित नहीं किया जा सकता क्योंकि भारत के अंदर सभी धर्म जाति के लोगों की अलग-अलग विशेषताएं पाई जाती है। भारत के अलग-अलग हिस्सो में ऐसे अनेक प्रकार के समूह रहते हैं जो आज भी सभ्यता या विकास से दूर जंगल, पहाड़,पठार, जैसे पर्यावरण, में अपना रहन सहन कर जिन्हें हम आम तौर पर आदिवासी, वनवासी,तथा जनजाति के आधार से उनकी पहचान करते हैं।

डॉक्टर बीएम मजूमदार

के अनुसार जनजाति परिवारों या फिर परिवारों के समूह का एक गुठ होता है जिनका एक सामान्य नाम होता है जिनके सदस्य एक भूभाग तथा एक सीमित क्षेत्र में एक जैसी भाषा का प्रयोग करते हैं तथा विवाह ,उद्योग ,व्यवसाय, के विषय में कुछ विषयों का पालन करते हैं और एक निश्चित और उपयोगी संसाधनों का आदान प्रदान करके व्यवस्था का विकास करते हैं।  

भारत में किसी जन जाति को अनुसूचित जनजातियों का दर्जा देने का अधिकार केवल भारत के राष्ट्रपति को ही होता है अनुसूचित शब्द का प्रयोग या फिर हम कह सकते हैं अनुसूचित जातियों शब्द का प्रयोग पहली बार सन 1929 में किया गया था जोकि साइमन कमीशन ने प्रस्तावित किया था जिसे 1947 में सविधान ने भी स्वीकार किया है।

अनुसूचित जनजातियों के लिए संवैधानिक प्रावधान कौन-कौन से है।

भारतीय संविधान के भाग 10 में तथा अनुसूची 5 व 6 में इसका विस्तार पूर्वक विवरण दिया गया है जो अनुसूचित और जनजाति के क्षेत्र के प्रशासन व नियंत्रण के बारे में कुछ प्रावधान करते हैं।

अनुच्छेद 244- अनुसूचित क्षेत्रों और जनजाति क्षेत्रों का प्रशासन।  

पांचवी अनुसूची के उपबंध असम मेघालय त्रिपुरा मिजोरम राज्यों से भिन्न किसी राज्य के अनुसूचित क्षेत्रों और अनुसूचित जनजातियों के प्रशासन और नियंत्रण के लिए लागू होंगे.

अनुच्छेद 244A – इस अनुच्छेद में असम के कुछ जनजाति क्षेत्रों को सम्मिलित करने वाला एक स्वशासी राज्य बनाने और उसके लिए स्थानीय विधानमंडल या मंत्रिपरिषद या दोनों का सृजन करने का प्रावधान करता है।

अनुच्छेद 342

राष्ट्रपति, करने के पश्चात के किसी राज्य तथा संघ राज्य क्षेत्र के संबंध में और जहां वह राज्य स्थित है वहां उसके राज्यपाल से परामर्श करने के पश्चात लोक अधिसूचना द्वारा जनजातियों या जनजाति समुदाय अथवा जनजातियों या जनजाति समुदाय के भागों को परिभाषित कर सकेगा जिन्हें इस संविधान के प्रयोजनों के लिए यथास्थिति उस राज्य या संघ क्षेत्र में अनुसूचित जनजातियां समझ आ जाएगा. आसान शब्दों में अगर समझे, तो जनजातियों वाले क्षेत्र में राष्ट्रपति अपने राज्यपाल को नियुक्त करते हैं वहां के जन के लिए तथा वहां पर भारतीय संविधान के अनुसार ही कानून तथा नियमों का पालन करना होता है।  

इस उपबंध में संसद को यह शक्ति प्रदान की गई है कि वह किसी जनजाति या जनजाति वाले समुदाय को और किसी जनजातीय जनजाति समुदाय के भाग को खंड 1 के अधीन निकाली गई अधिसूचना में सम्मिलित कर अनुसूचित जनजातियों की सूची में शामिल कर सकेगी या फिर उसमें से अपवर्जित मतलब कि अलग कर सकेगी।

अनुच्छेद 330- लोकसभा में अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए थानों का आरक्षण प्रदान किया गया है भारतीय संविधान के अनुसार।  

अनुच्छेद 332- राज्यों की विधानसभाओं में अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के के लिए अनोखा आरक्षण प्रदान किया गया है।

अनुच्छेद 335- सेवाओं और उत्पादों के लिए अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए विशेष प्रकार के प्रावधान भारतीय संविधान में सम्मिलित किए गए हैं।  

अनुच्छेद 338- राष्ट्रीय अनुसूचित जाति व अनुसूचित जनजाति आयोग इस आयोग में एक अध्यक्ष एक उपाध्यक्ष व अन्य पांच सदस्य की व्यवस्था होगी।

अनुच्छेद 339- अनुसूचित क्षेत्रों के प्रशासन और अनुसूचित जनजातियों के कल्याण के बारे में संघ का नियंत्रण।  

अनुच्छेद 46- अनुसूचित जातियों तथा जनजातियों और दुर्बल वाले वर्गों के शिक्षा और अर्थ संबंधी हितों की अभिवृद्धि।  

अनुच्छेद 15(4) – इस अनुच्छेद के अंतर्गत राज्य को सामाजिक और शैक्षिक दृष्टि से पिछड़े हुए नागरिकों के किन्हीं वर्गों की उन्नति के लिए या अनुसूचित जातियों या अनुसूचित जनजातियों के लिए कोई विशेष उपबंध करने से निवारित नहीं करेगा।

अनुच्छेद 16(4) क – इस पर्याप्त नहीं है राज्य के अधीन सेवाओं में किसी वर्ग या वर्गों के पदों या विशेष दर्जा देने के मामले में आरक्षण के लिए बंद करने का अधिकार होगा।

अपने कम्प्युटर को स्लो तथा हैंग होने से कैसे रोके

अपने कम्प्युटर को स्लो तथा हैंग होने से कैसे रोके

अपने कम्प्युटर को सुपर फास्ट कैसे बनाए ।

दोस्तों सवाल आता है अपने कंप्यूटर को हम कैसे सुपर फास्ट यानी इस तरह अपने तरीके से सेट , कर पाए जिससे हमारे कंप्यूटर की परफॉर्मेंस चलते वक्त बहुत ही अच्छी हो जाए किसी प्रकार का कोई लेग तथा हैंग देखने को ना मिले दोस्तों कंप्यूटर की परफॉर्मेंस बढ़ाने से पहले सवाल आता है कि आपके कंप्यूटर या लैपटॉप में रैम कितनी है सारा खेल रैम का ही होता है अगर आपके कंप्यूटर में रैम 4GB से कम है तो दोस्तों आपको थोड़ी मुश्किलों का सामना आज के दौर में करना पड़ सकता है, क्योंकि आज के दौर में जो एप्लीकेशन कंप्यूटर की आती है उनका साइज थोड़ा ज्यादा बड़ा होता है जिसके कारण वह कंप्यूटर की हार्ड ड्राइव को कवर कर लेता है जिससे रेम पर इफेक्ट आता है तथा आपका कंप्यूटर स्लो हो जाता है।

क्या करे की कम्प्युटर स्लो ना पड़े ?

अगर आपको अपना कंप्यूटर स्लो होने से बचाना है तो दोस्तों सबसे पहले मैं आपको सलाह दूंगा कि आप एक एंटीवायरस खरीदे तथा उसे एक्टिवेट करके अपने कंप्यूटर में डालें और ध्यान रहे आपको एंटीवायरस इंटरनेट से डाउनलोड बिल्कुल भी नहीं करना किसी की भी बातों में आकर क्योंकि यूट्यूब पर हजारों ऐसी वीडियो है जो इंटरनेट से किए हुए एंटीवायरस का दावा करते हैं कि यहां एकदम अच्छा है लेकिन सबसे बड़ा कारण वही होता है आपके कंप्यूटर को स्लो करने में तथा वायरस डालने में।

आज के दौर में 400 से ₹500 के बीच आपको कोई भी एंटीवायरस आसानी से मिल जाएगा अगर आप दिल्ली के रहने वाले हैं तो आपको करोल बाग, नेहरू प्लेस में आसानी से 400 से ₹500 के बीच एंटीवायरस मिल जाएंगे अगर आप ऑनलाइन भी मंगाना चाहते हैं तो आप ऑनलाइन भी इसी रेंज में मंगा सकते हैं। अगर मैं आपको सलाह दूं तो आप या तो क्विक हील या फिर कैस्पर स्काई का ही एंटीवायरस इस्तेमाल करें।

क्विक हील पीसी टुनर

अपने कम्प्युटर को स्लो तथा हैंग होने से कैसे रोके

दोस्तों आपको जो पहला काम करना है अपने कंप्यूटर के लिए इंटरनेट से जाकर क्विक हील वेबसाइट से आपको कोई खेल पीसी ट्यूनर डाउनलोड करना है दोस्तों आप जो डाउनलोड करेंगे वह वेबसाइट कंपनी की ऑफिशल ही होनी चाहिए अन्यथा आपके कंप्यूटर में वायरस भी आ सकता है दोस्तों क्विक हील कंपनी ने फ्री मैं अपना यह टूल इस्तेमाल करने के लिए लोगों को दिया हुआ है इसे इस्तेमाल करके आप इंटरनेट से टेम्परारी फ़ाइल रजिस्ट्री क्लीनर, अन्यथा अन्य प्रकार की बेकार की फाइलें जो कंप्यूटर को स्लो करती हैं यह एप्लीकेशन उसे आसानी से हटा कर फेंक देती है।

हार्ड ड्राइव को डिस्क क्लीन अप

अपने कम्प्युटर को स्लो तथा हैंग होने से कैसे रोके

दोस्तों आपको अपने कंप्यूटर की लोकल डिस्क सी के ऊपर राइट क्लिक करना है तथा प्रॉपर्टीज में जाकर आपको जनरल विकल्प दिखाई देगा उसके नीचे आपको डिस्क क्लीनअप दिखाई पड़ेगा आपको उस पर क्लिक करके लोकल डिस्क सी में जितनी भी बेकार की फाइल है उस सब को वह डिस्क क्लीनअप ऑटोमेटिकली डिलीट कर देगा।

Window + R
अपने कम्प्युटर को स्लो तथा हैंग होने से कैसे रोके

दोस्तों अगला जो तरीका है उसे कहते हैं टेंपरेरी फाइल को डिलीट करना दोस्तों आपको अपने कीबोर्ड पर विंडो बटन के साथ और बटन को दबाना है उसके बाद आपको उसमें टाइप करना है temp और एंटर कर देना है एंटर करने के बाद कुछ टेंपरेरी फाइल आपके सामने आ जाएंगी आप उन्हें कंट्रोल ए प्रेस करके एक साथ डिलीट कर सकते हैं, दोस्तों एक बार हो जाने के बाद आपको विंडो आर का बटन दबाकर फिर से उसमें टाइप करना है %temp%  और फिर से इंटर करके जितनी भी व्यर्थ फाइल आपके सामने होंगी सारी की सारी इस बार आ जाएंगी और आप उन्हें एक साथ डिलीट कर देना।

डाउन लोड की हुई फ़ाइल

दोस्तों आखरी जो तरीका है अब वह बहुत ही सरल है आप आमतौर पर उसके ऊपर ध्यान नहीं देते होंगे आप देते भी होंगे तो देख कर अनदेखा कर देते होंगे दोस्तों आपको हमेशा इस बात का ध्यान रखना है कि आपके डेक्सटॉप पर ज्यादा फाइल्स कभी ना हो क्योंकि डेक्सटॉप पर अगर फाइल से रहेंगी तो वह बैकग्राउंड प्रोसेस में लगातार काम करते रहेंगे जिससे कंप्यूटर की रेम पर इफेक्ट पड़ता है बहुत ही ज्यादा तथा कंप्यूटर स्लो होना शुरू कर देता है।

 आपके कंप्यूटर में एक डाउनलोड का ऑप्शन तथा विकल्प होता है आप उसे जब भी ओपन करते होंगे तो आपको दिखता होगा बहुत सी फाइल है सारे फोल्डर में डाउनलोड हो चुकी हैं जैसे की वीडियोस,गानेफोटोकंप्रेस फाइल्सअनेक प्रकार की, आपको इस बात का भी ध्यान रखना है निश्चित तौर पर कि आपको डाउनलोड्स वाली जगह पर 100 से 150 एमबी से ज्यादा की फाइलें बिल्कुल भी नहीं रखनी क्योंकि अगर आप उसमें ज्यादा फाइल स्टोर करके रखेंगे तो आपके कंप्यूटर के लिए नुकसानदायक है उसके पीछे यह कारण है कि डाउनलोड मे पड़ी फाइलों का लिंक सीधा हार्ड ड्राइव तथा लोकल डिस्क सी से होता है जोकि डाउनलोड्स की स्टोरेज भरने पर सीधा हार्ड ड्राइव पर इफेक्ट डालती है दोस्तों अगर आपकी कंप्यूटर की हार्ड ड्राइव पर इफेक्ट पड़ेगा तो आमतौर पर आप की कंप्यूटर की रेम पर भी इफेक्ट पड़ता दिखेगा जिसके कारण आपकी कंप्यूटर की स्पीड तो हो जाएगी तथा वह बार-बार हैंग होता रहेगा।

आदिवासियों द्वारा किए गए संघर्ष और आंदोलन

आदिवासियो द्वारा किए गए आंदोलन ।

भारत लंबे समय से ब्रिटिश सरकार की गुलामी करता आ रहा था तथा भारतीयों को गुलामी की आदत पड़ चुकी थी समय बीतता गया और गुलामी अपने चरम पर थी तथा सारे मूल अधिकारों का हनन पूरी तरह से कर दिया गया था।

अंग्रेजों द्वारा तथा भारतवासियों को आजादी की उम्मीद बिल्कुल भी नहीं थी क्योंकि ब्रिटिश सरकार ने लगभग पूरे भारत पर ही अपना वर्चस्व कायम कर लिया था, अंग्रेजों ने अपने शासन की  नीतियों ने जिस तरह आदिवासियों का भी शोषण किया उसका जवाब आदिवासियों तथा उनके संगठनों ने विद्रोह तथा आंदोलन की शक्ल में अंग्रेजों का सामना किया। पहला आदिवासी आंदोलन 19वीं शताब्दी के उत्तर के हिस्से में हुआ आदिवासियों ने 1857 के विद्रोह में भी भाग लिया तथा अंग्रेजी सरकार का डटकर सामना किया।

तामर संघर्ष

तामर विद्रोह तमर के आदिवासियों ने सबसे पहले अंग्रेजो के खिलाफ आवाज उठाई 1789 से लेकर 1832 के दरमियान उन्होंने सात बार विद्रोह किया उनकी लड़ाई दिक साथ सांठगांठ वाली सरकार के खिलाफ थी उनका नेतृत्व तामर के भोलानाथ सहाय ने किया कायलपुर, कानपुरड़ाड़ा, वतसीला जालदा और सितली जैसे आसपास के इलाकों के आदिवासियों ने उनका पूरा समर्थन किया। 

आदिवासियों ने इस क्षेत्र के हर गांव के तत्वों को मार डाला उनकी संपत्ति लूट ली तथा उनके घरों को जला दिया साल 1835 में सरकार ने इस विद्रोह को दबा दिया उन्होंने प्रशासन के कुछ नियम आसान बनाएं तथा आदिवासी सरदार या गांव के मुखिया के जरिए प्रशासन बरकरार रखा।  

खेखार आंदोलन

संथालो द्वारा किया गया खेखार आंदोलन इस आंदोलन को 1833 में उजागर किया गया आदिवासियों को स्वाधीनता की प्रेरणा देने के लिए इस आंदोलन को किया गया,  ‘खेखारसंथालों का पुराना नाम था तथा यह नाम उन्हें प्राचीन समय में स्वाधीन होने की बात याद दिलाता था इस आंदोलन भागीरथ काझा के कारश्यामी उर्फ बाबाजी के नेतृत्व में शुरू किया गया उन्होंने लोगों को यह विश्वास दिलाया कि अगर वह ईश्वर की पूजा करेंगे और अपने पापों का प्रायश्चित करेंगे तो उनका स्वाधीनता का योग वापिस आ जाएगा तथा उनकी भूमि भी उन्हें वापस मिल जाएगी इस आंदोलन में गैर संथालों का उस जगह आना साफ मना था जिससे इस आंदोलन ने राजनीतिक रंग ले लिया।

संथाल विद्रोह

संथालों के  विद्रोह का मकसद था कि जमीदारों के दमन के खिलाफ जो संस्थानों की भूमि जबरन कब्जा कर लिया करते थे ,साथ ही यह विद्रोह उन महाजनों व सरकारी अधिकारियों के खिलाफ भी किया जा रहा था जो इस मामले में दोषी पाए गए थे संस्थालो की अगुवाई सिवेन्धु और काहनु नामक दो भाई कर रहे थे उनका एकमात्र लक्ष्य अपनी भूमि को वापस लेना था 60 दिन के इस आंदोलन के बाद 5000 वर्ग मील का क्षेत्र संथाल परगना घोषित कर दिया गया था और जमीनी मसलो से निपटने के लिए एक प्रशासनिक अध्यक्ष नियुक्त किया गया।

बाक्टा विद्रोह

बाक्टा विद्रोह का प्रचलन सन 1858 से 1895 तक के बीच हुआ यह आंदोलन छोटे नागपुर के अलग-अलग क्षेत्रों में होता रहा इसका उद्देश्य केवल जमीदारों को बाहर कर भूमि के प्राचीन अधिकार को बेहाल कर उसे आदिवासियों को सौंपना था। बाक्टा आंदोलन का दौर 3 भाग में चला जिसमें जमीदारों और काश्तकारों में काफी हिंसा हुई तथा आदिवासियों का यह विचार था कि उनके दुखों का राज अंग्रेजी शासन था जब कोई संवैधानिक हल निकल ही नहीं सकता था तो यह लोग हिंसक हो गए 1892 में इन्होंने ठेकेदारों व जर्मन मिशनरियों को मारने की योजना बनाई जिसमे वह पूरी तरह से नाकामयाब रहे थे।

बिरसा मुंडा

बिरसा मुंडा विद्रोह यह विद्रोह छोटानागपुर क्षेत्र का सबसे लोकप्रिय आंदोलन माना जाता है आज के दिनों में भी यह आंदोलन बिरसा मुंडा की अगवाई में जमीदारों व्यापारियों तथा सरकारी अधिकारियों के विरुद्ध किया जा रहा था क्योंकि सरकारी अधिकारी रैयतवाड़ी व्यवस्था तथा अर्थव्यवस्था का मुद्रीकरण करना चाहते थे इन कारणों से आदिवासियों की स्थिति शोचनीय हो गई तथा जमीदार महाजन व सरकारी अधिकारी सब आपस में मिलकर आदिवासियों का शोषण करने लगे, उनकी हालत और बद से बदतर कर दी।  

आदिवासी हिंसा पर उतारू हो गए तो सरकार को दखल देना पड़ा उसके बाद सरकार द्वारा नए काश्तकारी नियम बनाए गए भूमि के सही प्रकार से नए रिकॉर्ड बनाए गए  तथा आदिवासियों का नेतृत्व करने वाला बिरसा मुंडा एक बड़ा नायक बनकर उभरा अपने समुदाय के लोगो के लिए।

स्वामी विवेकानंद और भारतीयो का स्वाभिमान

स्वामी विवेकानंद और भारतवासियों के दिल में स्वाभिमान की भावना

राष्ट्रवाद और स्वामी विवेकानंद

स्वामी जी विवेकानंद एक बहुत ही सच्चे मन के राष्ट्रवादी थे वह विश्व के देशों में, भारत की जो स्थिति चल रही थी उसे लेकर वह बहुत ही चिंतित थे भारत ना केवल राजनीतिक रूप से भी ब्रिटेन का गुलाम बन चुका था बल्कि मानसिक स्थिति और बौद्धिक रूप से भी पूरी तरह से ब्रिटेन का गुलाम बन चुका था

ब्रिटिश शिक्षा पद्धति तथा रहन-सहन भारतीयवासियों के दिल दिमाग और पर बेठता जा रहा था, भारतवासी अपनी सच्चाई खोते जा रहे थे जिनका उन्हें आभास भी नहीं था इन्हीं सब बातों को लेकर स्वामी विवेकानंद बहुत ही चिंतित दिखाई पड़ते थे उन्होंने इस सब को रोकने के लिए भारतीयों के दिल में स्वाभिमान की भावना को जागृत किया

स्वामी विवेकानंद का लक्ष्य

स्वामी विवेकानंद ने प्राचीन भारतीय वैदिक धर्म तथा संस्कृति की अहमियत को समझते हुए यह सिद्ध करना चाहा कि भारत की सोई हुई आत्मा को अब जगाना ही होगा अगर वह समय से नहीं जागे तो वह जिंदगी भर गुलामी करते रह जाएंगे साथ ही भारत अपनी प्राचीन संस्कृति को भूल चुका है स्वामी जी ने भारत के राष्ट्रीय स्वाभिमान को उजागर करने के लिए प्राचीन हिंदू वैदिक धर्म को अपना आधार बनाया और जो लोग भारतवासी ब्रिटिश सरकार की सदियों से गुलामी कर रहे थे अब स्वामी विवेकानंद ने उन्हें गुलामी से आजादी दिलाने पूर्ण रूप से मन बना लिया था।

धार्मिक और आध्यात्मिक का पुनर्निर्माण

स्वामी विवेकानंद ने भारतीयों में आत्मविश्वास को जगाने के लिए वेदों और उपनिषदों का भी सहारा निरंतर लिया तथा उन्होंने भारतीयों को  करते हुए कहा की उपनिषदों की ओर वापस चलो तथा उपनिषदों द्वारा स्थापित सत्य आपके सामने उन पर अमल करो तथा भारत की मुक्ति शीघ्र ही होगी।

स्वामी जी ने राष्ट्रवाद की आध्यात्मिक व्याख्या प्रस्तुत करते हुए स्वामी जी यह अच्छी तरह से समझते थे कि सदियों तक दास बने रहना और गुलामी करना तथा जंजीरों में जकड़े रहने के कारण भारतवासियों की आत्मा पूरी तरह सो चुकी है , उनका स्वाभिमान पूरी तरह मर चुका है, भारत की आत्मा को पुनर्जीवन देने तथा राष्ट्रीय स्वाभिमान को जगाने के लिए एक धार्मिक तथा आध्यात्मिक चेतना की आवश्यकता थी।

स्वामी विवेकानंद द्वारा भारत के प्राचीन धार्मिक तथा आध्यात्मिक गौरव की याद दिलाते हुए भारत वासियों को उस गौरव को फिर से प्राप्त करने का साहस दिलाया तथा भारत वासियों में प्रचलित अलग-अलग मत के खिलाफ स्वामी विवेकानंद रहते थे।

एक ऐसे सामान्य वर्ग का विकास करना चाहते थे, जिसमें विभिन्न धार्मिक मतों के प्रमुख सिद्धांत मिले-जुले हो उनका मानना था कि इन धार्मिक मतों का पृथक अस्तित्व तो बना रहे परंतु इनसे राष्ट्रीय एकता में कोई भी रुकावट नहीं आनी चाहिए उन्होंने अपने इस सामान्य धर्म की व्याख्या करते हुए बताया वेदांत का मस्तिष्क बौद्ध की करुणा तथा इस्लाम का शरीर होना चाहिए विवेकानंद इस प्रकार के धर्म के द्वारा राष्ट्रीय एकता को सशक्त करना चाहते थे।

हीगल की विचारधारा और स्वामी जी

हीगल की ही तरह स्वामी विवेकानंद का मानना था कि हर एक राष्ट्रीय का एक मिशन होता है वह राममोहन राय तथा केशवचंद्र चीन की इस अवधारणा से सहमत नहीं थे कि इंग्लैंड का मिशन भारत को एक ही रास्ता तथा सबवे बनाना है इसके विपरीत स्वामी जी का मत था कि भारत का मिशन ब्रिटेन सहित यूरोप को अध्यात्मिक संदेश देना है पश्चिमी देशों में अत्यधिक भौतिकवाद के कारण धार्मिक तथा आध्यात्मिक मूल्य पूरी तरह से विलुप्त हो चुके थे जिससे कि पश्चिमी सभ्यता पूर्ण रूप से खत्म हो गई थी पश्चिमी सभ्यता में भारत के धार्मिक एवं आध्यात्मिक मूल्यों का समावेश आवश्यक ही होता है भारत की पश्चिम को धार्मिक तथा आध्यात्मिक संदेश दे सकने में समर्थ है                                              

विनायक दामोदर सावरकर की विचारधारा और ब्रिटिश सरकार

विनायक दामोदर सावरकर की विचारधारा और  ब्रिटिश सरकार

विनायक दामोदर सावरकर की विचारधारा किस प्रकार की थी ?

विनायक दामोदर सावरकर का जन्म साल 1883 में हुआ था वह एक ऊंचे विचार वाले पक्के राष्ट्रवादी थे तथा क्रांतिकारी सेनानी थे जो कि अपने सहासिक राजनीतिक कार्यों से प्रकाश में आए थे।

सावरकर का जीवन अत्यधिक जेल में ही बीता उनके क्रांतिकारी होने के कारण अंग्रेज हमेशा उनसे अपना किनारा किया करते थे तथा मौका मिलते ही उनको जेल में डाल दिया करते थे उसके पीछे यह कारण था कि सावरकर भारत वासियों के लिए एक उम्मीद बनते जा रहे थे साथ ही वह क्रांतिकारी कार्यों में हमेशा अपना योगदान सबसे आगे रखा करते हैं उन्होंने ब्रिटिश सरकार के खिलाफ बहुत से आंदोलन किए तथा समय-समय पर ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध आवाज उठाई थी।

1906 से लेकर 1910 तक सावरकर को इंग्लैंड में शिक्षा प्राप्त करते समय ही क्रांतिकारी क्रियाकलापों को जारी रखा जिसके वजह से उन्हें 50 वर्षों के कारावास का दंड देकर अंडमान में एक जेल में बंद कर दिया गया जिसे सेल्यूलर जेल कहते हैं जहां से सावरकर 1937 में आजाद हुए हैं जिसके पश्चात उन्होंने डेमोक्रेटिक स्वराज पार्टी तथा बाद में हिंदू महासभा की सदस्यता ग्रहण की।

सावरकर का राजनीतिक दर्शन।

सावरकर का राजनीतिक दर्शन भारत के राष्ट्रीय स्वरूप पर ही केंद्रित माना जाता था उनका यह प्रबल तर्क था कि अधिक संख्या हिंदुओं द्वारा अनुशासित धार्मिक व्यवस्था के रूप में हिंदुत्व की व्याख्या के विपरीत यह हिंदुत्व अथवा जनमानस और चेतना में व्याप्त हिंदुत्व ही है।

भारत की राष्ट्रीयता के केंद्र में स्थित है इसी प्रकार की अवधारणा में हिंदुत्व के अंतर्गत इस देश के अनेक स्थानीय धर्म और भौगोलिक रूप से निकट देशों के जन समुदाय भी आते हैं , क्योंकि वह सभी हिंदू धर्म से ही निकले हैं अनेक रंग तो और कला हिंदू धर्म जीवंत है और विकास कर रहे हैं तथा हिंदू संस्कृति के परिवेश में अपना अस्तित्व सजा हुए हैं हिंदुओं के लिए धर्म की पहचान इतनी पूर्णता के साथ देश से जुड़ी है कि यह देश उनके लिए ना केवल पित्र भूमि ही है बल्कि पुण्यभूमि भी है।

सावरकर और राष्ट्रवाद

विनायक दामोदर सावरकर के अनुसार उनका मत था कि हिंदुस्तान में जन्मे तथा पले हर एक इंसान को चाहे वह किसी भी धर्म जाति से ताल्लुक रखता हो उसे अपने देश के हित में कार्य करने चाहिए तथा एक सच्चा राष्ट्रवादी बनना चाहिए ।

सावरकर के मत के अनुसार उनका मानना था कि सभी धर्म जिसमें हिंदू मुस्लिम सिख इसाई जैन पारसी जो भी हिंदुस्तान में रहते हैं उन्हें हिंदुत्व को ही बढ़ावा देना चाहिए जिससे विश्व भर में हमारे देश का नाम रोशन हो सके सावरकर के अनुसार केवल हिंदुत्व की विचारधारा ही हिंदुस्तान को आगे बढ़ा सकती थी।

सावरकर के अनुसार देश के अल्पसंख्यकों को हिंदुत्व के विकास को बढ़ावा देने के लिए बहु संख्यक हिंदुओं से सहयोग करना चाहिए तथा खुद को राष्ट्रीय के सामाजिक आर्थिक तथा राजनीतिक जीवन में काम लाना चाहिए।

आजादी की पहली पुकार को उजागर करने वाला व्यक्ति सावरकर।

सावरकर ने अपने जन्म के कुछ समय बाद से ही ब्रिटिश सरकार के खिलाफ आंदोलन करने शुरू कर दिए थे जिसके कारण ब्रिटिश सरकार सावरकर को हमेशा से ही जेल में बंद रखना चाहती थी तथा सावरकर के ऊपर अनेक प्रकार के झूठे इल्जाम लगाकर उस पर मुकदमा चलाया करती थी।

ब्रिटिश सरकार हमेशा ही सावरकर को लगभग लगभग जेल में ही रखा करती थी, उनके क्रांतिकारी आंदोलनों के कारण तथा जेल में उन पर अनेक अनेक प्रकार के अत्याचार किए जाते थे तथा उन्हें दंडित भी किया जाता था ।

विनायक दामोदर सावरकर ही पहले व्यक्ति थे जिन्होंने 1857 की क्रांति को भारत वासियों को एक सच्चाई से सामना करवाया था कि आजादी की पहली आवाज 1857 में ही उठा दी गई थी यह बात केवल सावरकर और कुछ ही लोगों को पता था जो कि क्रांतिकारी आंदोलन करके हमेशा ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध ही रहा करते थे ब्रिटिश सरकार ने इस बात को गंभीरता से लेते हुए सावरकर तथा उसके समर्थक जो उनका आंदोलन में साथ दिया करते थे। 

ब्रिटिश सरकार द्वारा उन्हें सेल्यूलर जेल में ही डाल दिया गया साल 1907 में सावरकर ने सेल्यूलर जेल जाते वक्त भागने की कोशिश की वह पानी के जहाज से कूद गए तथा तहरते हुए वह एक अलग जगह पर पहुंच गए लेकिन वह कामयाब ना हो पाए ब्रिटिश सरकार ने कुछ घंटों बाद ही उन्हें फिर से पकड़ लिया और सेल्यूलर जेल में ले जाकर बंद कर दिया गया।

ब्रिटिश सरकार को केवल एक ही डर सावरकर की ओर से सताता था कि अगर इसको हमने खुला रखा तो यह भारतवासियों के दिल में आजादी की भावना पैदा कर देगा जिससे हम हमारा शासन का अंत जल्दी ही हो जाएगा लेकिन लोगों ने सावरकर पर भरोसा ना करते हुए उनका साथ ना दिया बहुत ही कम लोग उनके समर्थन में आया करते थे।

सावरकर का जीवन सेल्यूलर जेल मे

विनायक दामोदर सावरकर का जीवन सेल्यूलर जेल में बहुत ही मुश्किल था उन पर अनेक अनेक प्रकार के अत्याचार किए गए ब्रिटिश सरकार ने अपने अधिकारियों से कहकर सावरकर के ऊपर एक से एक बढ़कर अत्याचार करवाएं जिससे सावरकर का जीवन अस्त-व्यस्त पूरा हो चुका था।

सावरकर अब अपने जीवन में थोड़ी आजादी चाहते थे क्योंकि उनका जीवन सदा ही जेल में बीता था सावरकर हिम्मत हार चुके थे क्योंकि लोगों ने उनका साथ देना बंद कर दिया था, ब्रिटिश सरकार उन पर झूठे मुकदमे चलाकर लोगों के बीच अफवाह फैलाया करती थी कि सावरकर ने आंतकवादी संगठन का समर्थन किया है तथा वहां हिंदुस्तान को बर्बाद करना चाहता है जिसके कारण लोगों ने अफवाहों में आकर सावरकर का साथ देना बंद कर दिया था।

ब्रिटिश सरकार द्वारा की गई धार्मिक राजनीति

जब सावरकर सेल्यूलर जेल में अपना जीवन बहुत ही कठिन परिश्रम करके व्यतीत कर रहे थे तब ब्रिटिश सरकार ने एक नीति बनाई जिसके द्वारा सावरकर की हत्या निश्चित थी ब्रिटिश सरकार ने एक जेलर को सावरकर के लिए नियुक्त किया जो कि एक मुस्लिम समुदाय से था।

ब्रिटिश सरकार ने उस मुस्लिम जेलर को झूठी बातों मे बहला-फुसलाकर सावरकर के खिलाफ साज़िश रची ब्रिटिश सरकार ने जेलर से कहा कि सावरकर मुस्लिम समुदाय का खात्मा चाहता है तथा उसका कहना है कि हिंदुस्तान में केवल हिंदुत्व विचारधारा वाले लोग ही राज करेंगे।

व जेलर ब्रिटिश सरकार के अधिकारियों की बातों में आ गया तथा सावरकर पर जुल्म करने शुरू कर दिए जिससे सावरकर का जीवन बहुत ही मुश्किल घड़ी में आ गया था लेकिन सावरकर ने इतने कष्ट सहने के बाद भी हिम्मत नहीं हारी वह तब भी ब्रिटिश सरकार के खिलाफ ही रहा लेकिन एक बात सावरकर के जहन में बैठ गई थी ,मुस्लिम समुदाय के लोग सावरकर का हमेशा बुरा चाहते हैं । ब्रिटिश सरकार द्वारा बनाई गई साजिश एकदम कामयाब रही सावरकर के दिल में मुस्लिम समुदाय के लिए घृणा हो गई तथा सावरकर ने मन बनाया कि अब वह केवल हिंदुत्व की विचारधारा पर ही चलेगा।

असहयोग आंदोलन और सावरकर

साल 1920 का वक्त था जब गांधी जी ने असहयोग आंदोलन को एकदम चरम पर था, अंग्रेजी सरकार के खिलाफ जो की रोलेट एक्ट के विरोध में आंदोलन किया जा रहा था ब्रिटिश सरकार बहुत ही घबरा गई अंग्रेजी सरकार ने सावरकर को लेकर एक साजिश रची , क्योंकि सावरकर अब मुस्लिम समुदाय के खिलाफ हो चुके थे जेल के अंदर अत्याचार सहने के बाद सरकार।

ब्रिटिश सरकार ने सावरकर को रिहा कर दिया 1920 में जब वह बाहर आए तो सावरकर ने एक नारा दिया एक देश,  एक भेष,  एक विचारधारा केवल हिंदुत्व, जिससे मुस्लिम समुदाय के लोग भड़क उठे और आंदोलन में हिंसा फैल गई जिसके कारण आंदोलन ज्यादा ना चल सका अंग्रेज़ो द्वारा रची गई साजिश एकदम कामयाब रही।

साल 1925 में सावरकर की मुलाकात वल्लभभाई हेडगेवार से हुई जो कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के निर्माता थे सावरकर ने उनके साथ मिलकर हिंदुत्व विचारधारा का प्रचलन किया और मुस्लिम समुदाय के खिलाफ हो गए सावरकर के अनुसार अब केवल हिंदुत्व ही देश में रहना चाहिए सावरकर का कहना था कि हिंदुस्तान में केवल हिंदू धर्म के लोग ही रहेंगे क्योंकि सावरकर जेल में अंग्रेजी साजिश का शिकार हो चुके थे इसलिए सावरकर के मन में केवल अब हिंदुत्व के लोग ही मान्यता रखते थे।

मोहम्मद अली जिन्ना और द्विराष्ट्र सिद्धांत

मोहम्मद अली जिन्ना और द्विराष्ट्र सिद्धांत

द्विराष्ट्र सिद्धांत सिधान्त कहा से उजागर हुआ , और इसकी मांग किसने की?

समय था 20 मार्च 1940 मोहम्मद अली जिन्ना अपने कड़े रुख पर अटके हुए थे उनका मानना था कि द्विराष्ट्र सिद्धांत ही मुसलमानों की रक्षा कर सकता है अगर उनको भी राष्ट्रीय सिद्धांत में पाकिस्तान नहीं मिलता तो वह मुसलमानों का अंत माना जाएगा।

साइमन कमीशन की रिपोर्ट तथा जवाहरलाल नेहरू की रिपोर्ट को मोहम्मद अली जिन्ना ने अस्वीकार करने के बाद जिन्ना के मन में निरंतर हिंदू मुस्लिम एकता के स्थान पर  दो राष्ट्रीय सिद्धांत की बात अपने मन में बैठा चुके थे, वह अपनी बात पर टस से मस होते नहीं दिख रहे थे, उन्हें एक अलग मुस्लिम राष्ट्र चाहिए ही चाहिए था।

मोहम्मद अली जिन्ना के अनुसार हिंदू और मुसलमान एकता का निर्माण कभी नहीं कर सकते क्यूकी वह अलग अलग राष्ट्रों का प्रतिनिधित्व करते करने लगे संघीय उपसमिति के अध्यक्ष के रूप में उनका कथन था, कि आप कोई भी संविधान बना लीजिए लेकिन केवल एक मात्र ही उपाय हम मुसलमानों के अधिकारो  को बचा सकता है वह केवल  दो राष्ट्रीय सिद्धांत ही है।

मुसलमानो की संस्कृति को लेकर जिन्ना का विषय चिंताजनक क्यो था ?

मोहम्मद अली जिन्ना के अनुसार जब तक वह मुसलमानों और दूसरों अल्पमत वाले लोगों को सुरक्षा प्रदान नहीं कर देते वह इस बात पर बल देने लगे थे क्योंकि मुसलमान अलग राष्ट्रीय है और उन्हें अपनी संस्कृति तथा अलग व्यक्तित्व की रक्षा करनी ही पड़ेगी तथा उनका यह भी मत था कि हिंदू अतिवादी मुसलमानों के अस्तित्व के लिए खतरा है उन्होंने कांग्रेस को एक हिंदू दल बताया जो हिंदू राज स्थापित करना चाहती थी उनका मत था कि प्रजातंत्र की स्थापना का अर्थ मुसलमानों का सर्वनाश होगा।

जिन्ना के द्वारा पाकिस्तान की मांग

मोहम्मद अली जिन्ना ने पाकिस्तान की मांग का समर्थन करते हुए या मत दिया कि हिंदू तथा मुसलमान दो अलग-अलग सभ्यताएं तथा अलग-अलग विचार धाराएं हैं वह अलग-अलग धर्मों से संबंधित हैं और उनका दर्शन रीति रिवाज संस्कृति इत्यादि सभी भिन्न है उन्होंने कांग्रेस को मुसलमानों को अलग छोड़ने की बात कही उन्होंने मुसलमानों की तुलना अफ्रीका के नीग्रो तथा दासों से की 20 मार्च 1940 को जिन्ना ने भारत का विभाजन स्वतंत्र स्वशासी राष्ट्रीय राज्यों में करने की मांग की जिन्ना का मानना था कि मुस्लिम राजनीति से धर्म को अलग नहीं किया जा सकता इसलिए हिंदू मुस्लिम एकता या राष्ट्रवाद को हिंदू मुसलमानों की गैर धार्मिक मामलों में एकरूपता पर आधारित हूं कल्पना से बाहर की बात है मुसलमानों के लिए एक अलग राष्ट्र की बात की गई।

जिन्ना द्वारा राजनीतिक हथियार

साल 1945 के चुनाव अभियान के दौरान मोहम्मद अली जिन्ना ने यह नारा दिया कि ‘पाकिस्तान हमारे लिए जीवन मरण का प्रश्न है’  तथा पाकिस्तान की मांग जून 20, 1947 में बंगाल विधानसभा के सदस्यों ने बहुमत से बंगाल के विभाजन के लिए मतदान किया था तथा बाद में यही कार्यवाही सिंध में हुई, विभाजन समिति का निर्माण किया गया अलग मुस्लिम राष्ट्र वाद का जन्म तो पहले ही हो चुका था जिन्ना ने इसे राजनीतिक हथियार के रूप में बदल दिया था तथा पाकिस्तान रूपी नए राज्य का निर्माण किया जा सके तथा उन्हें दो राष्ट्रीयसिद्धांत को, सैद्धांतिक तथा धार्मिक दूरियो का रंग दे दिया।  

सत्याग्रह पर महात्मा गांधी जी के विचार तथा दृष्टिकोण

सत्याग्रह पर महात्मा गांधी जी के विचार तथा दृष्टिकोण

गांधी जी और सत्याग्रह

गांधी जी द्वारा सत्याग्रह का विचार तो सामने रखा ही था उन्होंने सत्याग्रह की अलग-अलग पद्धतियों के बारे में बहुत ही विस्तारपूर्वक समझाया है। गांधीजी के अनुसार अलग-अलग परिस्थितियों के अनुसार सत्य ग्रह की अनेक पद्धतियां कुछ इस प्रकार थी।

विरोधियो का नम्र दिल होना

आत्मपीड़न के द्वारा विरोधियों का हृदय परिवर्तन गांधी जी की सत्य ग्रह की पद्धतियों में आत्म पीड़न का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान रखा गया था गांधीजी का मानना था कि आत्म पीड़न के द्वारा अथवा सत्य के लिए तपस्या करने को कहा था।

गांधी जी का मानना था कि हाथ में पीड़न के द्वारा विरोधी पर अनुकूल प्रभाव होगा साथ ही वह अपनी गलतियों का एहसास भी करेगा परंतु सत्याग्रही को अपने ऊपर संयम रखते हुए विरोधी की किसी भी बात से अपना आपा नहीं खोना है साथ ही आत्म सम्मान पर चोट के अलावा सभी प्रकार हानि उस समय तक बर्दाश्त करनी चाहिए जब तक विरोधी को अपनी गलतियों का एहसास ना हो।

अहिंसात्मक

महात्मा गांधी जी के अनुसार विरोधी को अपनी बातें मनवाने का एक अन्य तरीका  असहयोग है, लेकिन वह इस संबंध में हिदायत देते हैं कि यह सहयोग पूर्ण रूप से अहिंसक होना चाहिए असहयोग में हिंसा के प्रवेश से और अधिक बुराइयों का उत्पन्न होता है उनके विचार में असहयोग का स्वरूप अहिंसात्मक ही हमेशा रहना चाहिए तभी यह अपने लक्ष्य को प्राप्त कर सकेगा

गांधीजी ने अहिंसात्मक और असहयोग को व्यथित प्रेम की अभिव्यक्ति बताया है असहयोग उद्देश्य विरोधी को हिंसा से मुक्त कराना तथा उसके पश्चात उसके साथ सदैव असहयोग करना भी है आज सहयोग की भावना को साफ करते हुए गांधीजी ने एक बार कुमारी अगाधा हैरिसन को बताया था क्यों सत्याग्रह के शस्त्रागार का मैं आज असहयोग मुख्य हथियार होता है तथा यह नहीं भूलना चाहिए कि सत्य तथा न्याय के द्वारा विरोधी का सहयोग प्राप्त करने का एक मात्र साधन है।

गांधीजी के अनुसार असहयोग के मूल में यह विचार है कि दुष्ट व्यक्ति तब तक उद्देश्य में सफल नहीं होता जब तक कि उसको न्याय का शिकार व्यक्ति उसके साथ सहयोग ना करता हो , भले ही वह विवशता अथवा मजबूरी में ही ऐसा क्यों ना करें ऐसी स्थिति में सत्याग्रही का कर्तव्य है कि अन्याय के प्रतिरोध के कारण उसे कितने भी परेशानी क्यों ही ना उठानी पड़े अन्याय की इच्छा को पूरा देश के सामने झुकना कभी नहीं चाहिए गांधीजी के अनुसार और सहयोग का प्रयोग दिन प्रतिदिन की समस्याओं को हल करने के लिए सार्वभौमिक उपचार के रूप में बहुत ही सरलता पूर्वक किया जा सकता है इसका प्रयोग घनिष्ठ व्यक्ति को सत्य तथा न्याय के मार्ग पर लाने के लिए भी किया जा सकता है।

उपवास और विरोधी पर दबाव डालना

महात्मा गांधी जी के अनुसार सत्याग्रह के शस्त्रागार में सर्वाधिक शक्तिशाली हथियार उपवास ही होता है उनका यह भी कहना है कि इसका उपयोग बहुत सोचने विचारने के बाद तथा विशेष परिस्थितियों में ही कर आ जाना चाहिए अन्यथा वह ‘दुराग्रह’ कहलाएगा।

गांधी जी का यह भी कहना है कि उपवास व्रत तपस्या है जिसे की शांति तथा प्रेम पूर्ण ह्रदय ही प्रयोग में ला सकता है उपवास के द्वारा सत्यग्राही विपक्षी के दिलों में दबाव डालने के लिए नहीं किया जाना चाहिए, इसका इस्तेमाल केवल उसी व्यक्ति को करना चाहिए जिसका ईश्वर हमें पूरा विश्वास हो तथा इसका नैतिक चरित्र चरित्र पहुंचा हो गांधी जी ने उपवास तथा भूख हड़ताल में अंतर बताते हुए कहा कि उपवास करने वाले सत्याग्रही के पास काफी मात्र मे शक्ति तथा साफ विचार सहित स्पष्ट दृष्टि भी होनी अनिवार्य है।

सत्याग्रही को ,क्रोध ,अधेर्य , स्वार्थ , तथा बदले की भावना से दूर ही रहना चाहिए अन्यथा उपवास हिंसक हो जाता है दूसरी और भूख हड़ताल दबाव का तरीका है जिसके द्वारा विरोधी को अपनी बात मनवाने के लिए दबाव डाला जाता है गांधी जी ने तो आज के  व्यक्तित्व साधन से सामाजिक साधन बना दिया गांधी जी द्वारा किए गए उपवासों को जनता पर हमेशा ही सकारात्मक परिणाम देखने को मिला है।  

हड़ताल किस प्रकार सहयोगी है।

गांधी जी ने हड़ताल को असहयोग का एक रूप बताया है हड़ताल अर्थ अपने संपूर्ण कामकाज को ठप कर देना होता है इसमें अपनी ही इच्छा होती है इसके अंतर्गत ना केवल अपना निजी कार्य व्यवसाय तथा नौकरी आदि ठप कर देना होता है तथा स्कूल तथा कॉलेज भी जाना भी इसमें सम्मिलित हो जाता है। इसका उद्देश्य केवल जनता तथा सरकार का ध्यान अपनी मांगों की ओर आकर्षित करना है।

गांधी जी का विचार था कि हड़ताल का प्रयोग बार-बार नहीं किया जाना चाहिए क्योंकि जनता तथा सरकार का इस पर कोई प्रभाव नहीं होगा उन्होंने यह भी सुझाव दिया कि हड़ताली ऐच्छिक होनी चाहिए कर्मचारियों को काम से रोकने के लिए उन पर दबाव नहीं डाला जाना चाहिए गांधीजी हड़ताल के दुरुपयोग के प्रति भी चिंतित भी रहते थे, इसलिए उन्होंने कहा कि कर्मचारियों को अपने मालिकों से अनुमति प्राप्त करने के पश्चात ही हड़ताल करनी चाहिए उनके अनुसार सामान्य परिस्थितियों में हड़ताल का प्रयोग बिल्कुल भी सही नहीं है।

सामाजिक बहिष्कार के ऊपर गांधी जी के विचार

सत्याग्रह एक अन्य तरीका सामाजिक बहिष्कार भी है यह शांतिपूर्ण तरीके तथा हिंसात्मक दोनों ही प्रकार का हो सकता है यह इसके प्रयोग करने के तरीके पर निर्भर करता है कि आप किस प्रकार इसका उपयोग तथा दुरुपयोग करते हो गांधीजी का मानना था कि सामाजिक जीवन में इस अस्त्र का प्रयोग किसी ना किसी रूप में अवश्य किया जाता है। गांधी जी ने इसका प्रयोग अत्यंत सीमित रूप में करने का सुझाव दिया है इसका प्रयोग केवल उन्हीं लोगों के खिलाफ किया जाना चाहिए जो असहयोग का समर्थन नहीं करते तथा उसकी अवहेलना करते हैं,  अथवा हड़ताल के समय जो हड़ताल में बाधा डालते हैं उनका सामाजिक बहिष्कार करना चाहिए।

धरने द्वारा अपना जनमत उजागर करना

धरना भी का असहयोग का ही मूलभूत रूप माना जाता है तथा गांधीजी ने धरने को भी सत्याग्रह का एक तरीका ही बताया है पर उनका सुझाव है कि इसका प्रयोग अहिंसात्मक कार्यवाही के रूप में ही किया जाना चाहिए इसका प्रयोग भी बहुत ही सूझबूझ कर के  किया जाना चाहिए बाध्यकारी तरीके से बिल्कुल भी नहीं होना चाहिए।

गांधीजी ने 1920 तथा 1922 के असहयोग आंदोलन तथा 1930 के सविनय अवज्ञा आंदोलन में शराब, तथा अन्य मादक वस्तुओं, तथा विदेशी, कपड़ों , की दुकानों पर धरने को कांग्रेस का सबसे महत्वपूर्ण कार्य बनाया लेकिन वह रास्ता रोकने के लिए धरने के प्रयोग के पक्ष में नहीं थे। व इसे वैसे हिंसात्मक कार्य मानते थे गांधीजी के अनुसार शांतिपूर्ण धरने का उद्देश्य ऐसे लोगों के विरुद्ध कार्य करते हैं तिरस्कार करना तथा उन्हें शर्म महसूस कराना होता था।

सविनय अवज्ञा की महत्वता

गांधी जी ने सामान्य परिस्थितियों में लोगों को सरकार के आदेशों का पालन करने का सुझाव दिया यदि सरकार जनता की भावनाओं की उपेक्षा करें तथा उन्हें दबाने के लिए अन्यायपूर्ण तरीके अपनाएं तो नागरिकों को चाहिए कि वह ऐसी सरकार के साथ और असहयोग करें। सविनय अवज्ञा असहयोग का एक बहुत ही महत्वपूर्ण रूप है गांधीजी ने इसे सशस्त्र क्रांति का रखते हैं तथा प्रभाव कारी विकल्प माना।

फासीवाद तथा फासिस्ट पार्टी और मुसोलिनी का दौर

जर्मनी मे फासीवाद और फासिस्ट पार्टी

फासीवाद के अधीन राज्य

समय था 1926 का फासीवादी राज्य एक व्यक्ति की तानाशाही की संस्था के रूप में स्थित होता जा रहा था इटली में अक्टूबर 1926 में सभी विपक्षी दलों और संगठनों पर प्रतिबंध लगा दिया गया था जो कि एक अलोकतांत्रिक विपदा और इसी के दरमियान जन सुरक्षा कानून 1926 राज्य की सुरक्षा को व्यक्तिगत अधिकारों से बहुत ही ऊपर रखा गया।

फासिस्ट पार्टी को स्वयं ही अधिकारी तंत्र बना दिया गया और श्रमिक और संघवादी विचारों को पार्टी के भीतर ही दबा के रखा गया उत्तर इटली के बहुत से उद्योगपतियों ने जिनमें फिएट तथा अन्य भी शामिल थी।

मुसोलिनी के फासीवादी संगठन का खूब समर्थन तथा पैसा दिया निजी पूंजी श्रमिकों के फासीवाद नियंत्रण की  लाभ ग्राही होती थी राज्य की स्थापना 1934 में नियोक्ताओं व कर्मचारियों के 22 संयुक्त निगमों को लेकर की गई थी परंतु उनके पास आर्थिक निर्णय लिए जाने की वास्तविकता शक्ति का अभाव इतावली राष्ट्र की आर्थिक जीवन में हस्तक्षेप आशीर्वाद शासन के शुरुआती हिस्सों में  कम ही था।

राज्य और उसका समर्थन

महाअवसाद मतलब एक बुरा समय और अपने आक्रामक राष्ट्रवादी से न्यायवादी परियोजना हेतु साम्राज्यवादी महत्वाकांक्षाओं को पूरा करने की आवश्यकता ने विशेष रूप से भूमध्य सागर और अफ्रीका में आर्थिक जीवन में राज्य हस्तक्षेप को बढ़ाने की ओर देखें साल 1930 औद्योगिक पुनर्निर्माण संस्था आई आर आई की स्थापना ने आधुनिक युद्ध कार्य सेवा में आर्थिक मदद प्रदान की साथ ही 1940 में भी औद्योगिक पुणे पुनर्निर्माण संस्थान के पास इतावाली उद्योग की कुल पूंजीगत परिसंपत्तियों का लगभग 17.8 प्रतिशत ही था।

राज्य ने खासतौर पर रासायनिक विद्युत एवं यंत्र उद्योगों के विकास पर अधिक ध्यान दिया और रेल पथ तथा दूरवानी व आकाशवाणी उद्योग के विद्युतीकरण के माध्यम से आधुनिकरण को अत्यधिक प्रोत्साहन दिया उसी के दरमियान जर्मनी के मुकाबले इटली के युद्ध का एक स्थाई राज्य होने संबंधी शासन के बावजूद चीनी उत्पादन में निवेश कम ही था इसके अतिरिक्त एक अधिकार पूंजीवादी वर्ग के उग्र दोषारोपण ओं के बावजूद फासीवादी राज्य ने उत्पादक  संघीकरण के निर्माण में मदद की।

मुसोलिनी का दौर

मुसोलिनी ने भी खुश करने का बहुत ही अधिक प्रयास किया युद्ध से पहुंचे नुकसान तथा गिरजाघरो कि मरम्मत के लिए बड़ी बड़ी आर्थिक सहायताएं दी गई थी 1923 में सभी विद्यालयों में धार्मिक शिक्षा अनिवार्य कर दी गई रोम की समस्या 1929 में हल हो गई।  

चर्च के साथ लेटरीन समझौतों पर भी हस्ताक्षर किए गए जिसके माध्यम से धार्मिक शिक्षाओं का वास्तविक नियंत्रण मतलब एक अधिकार चर्चों के हाथों में सौंप दिया गया और वेटिकन पर शासन पोप के अधिकारों को मान्यता दी गई चर्च के प्रमुख संगठन कैथोलिक एक्शन को आजादी दे दी गई  लेकिन उन्हे चेताया गया की वह राजनीति से दूर रहें।

व्यक्तिगत तौर पर आजादी और सामाजिक जीवन पर पार्टी का हस्तक्षेप तथा नियंत्रण जर्मनी में और भी अधिक तथा सख्त रुख अपना रहा था इटली में बड़े-बड़े कारोबार उद्योग वित सेना एवं व्यवसायिक अधिकारी ने काफी हद तक एक अधिकार जमाए रखा और फासिज्म इन स्थापित संस्थाओं व अभिजात वर्गों के साथ एक अनकहे समझौते के आधार पर सत्ता में विलीन हो गया जर्मनी में शक्ति दाई अधिनियम इनेबलिंग एक्ट मार्च 1933 हिटलर की तानाशाही हेतु कानूनी आधार बन गया।

अधिकार कार्यकारिणी को  हस्तांतरित कर दिए गए अधिकारी तंत्र को राजनीतिक के रूप में आवंटित और अन्य आर्य तत्वों से मुक्त कर दिया गया राज्य के संघीय स्वरूप को नष्ट कर दिया गया तथा मूल  संवैधानिक अधिकारों पर पूरी तरह से प्रतिबंध लगा दिया गया कानून का शासन का अर्थ कि केवल अब नेता के शासन में तब्दील हो गया जिसके लिए अधिकारी वर्ग और सेना ने बिना शर्त आज्ञा पालन की शपथ ली थी के इतर कानूनी घोतन प्रशासनिक कार्यकाल में निर्णायक भूमिका धारण कर ली थी और संविधानवाद को दफन करने दिए जाने का संकेत दिया जा चुका था।

तानाशाही अपने चरम पर

फासिज्म के चलन में कुछ इस प्रकार की स्थितियां बनती दिखाई पड़ रही थी कि नेताओं की इच्छा ही कानून का आधार माना जा रहा था साथ ही न्यायपालिका की आजादी पूरी तरह से खत्म कर दी गई थी। इसके साथ समाचारों प्रथा मीडिया पर भी पूरा प्रतिबंध लगा दिया गया था उन्हें चेताया गया था कि सरकार के विरुद्ध जान आपके लिए हानिकारक भी हो सकता है। इसी के साथ प्रेस को बंद करने के लिए भी लगातार दबाव डाला जा रहा था।

फासीवाद अवधारणा के प्रति काफी हद तक विरोध पाए जाने वाले किसी भी साहित्य अथवा कला पर प्रतिबंध लगा दिया गया प्रचार तथा शिक्षा के माध्यम से नागरिकों के सांस्कृतिक जीवन पर लगातार नियंत्रण  शासन प्रणाली के मुख्य लक्षण में से एक बन गया था पूरी शिक्षा प्रणाली ही फासीवादी आदर्शा के अनुसार ही अपने कार्य को कर रही थी।

आजादी का एकदम सर्वनाश हो चुका था पाठ्य पुस्तकें दो बार लिखी जा रही थी यह उद्योगों द्वारा अध्यापन कार्य बंद कर दिए गए और जर्मन प्रमुख जाति सर्वोच्चता संबंधित प्रजातीय सिद्धांत पाठ्यक्रमों का हिस्सा बन गया।

यहूदियो पर तानाशाही

जर्मनी में नाजी पार्टी की विचारधारा का यहूदियों के प्रति नफरत और जाति को अपशब्द बताया गया साथ ही कहा गया कि आने वाले समय में भी यह जातियां अशुद्ध ही मानी जाएगी जर्मनी के प्रजातीय रूप से अशुद्ध और सभी बुराइयों की जड़ के रूप में थे।

नागरिकता विश्वविद्यालयों व प्रशासन में स्थान आदि से उन्हें एकदम वंचित कर दिया गया था उनके कारोबार पर हमले भी करवाए जा रहे थे तथा वह समाज में एक बहुत ही उच्च स्तर के भेदभाव से जूझ रहे थे द्वितीय विश्व युद्ध के दरमियान उनमें से लाखों को नजर बंदी छोर में भी डाल दिया गया और उन्हें सड़कों पर मारा गया कम से कम 1937 तक तो इतावली फासिज्म में प्रजातीय साम्यवाद विरोध संबंधी किसी भी योजना वृत्ति का अभाव रहा तथा नवंबर 1938 तक इटली में नाजियों के व्यक्ति विशेष की प्रजातियां तथा यहूदियों के विरुद्ध अनेक कानून पास किए गए।