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भारत और बांग्लादेश के बीच अटका न्यू मुरे द्वीप विवाद

भारत और बांग्लादेश के बीच अटका न्यू मुरे द्वीप विवाद

भारत और बांग्लादेश के बीच किस प्रकार के संबंध

दिसंबर 1971 में बांग्लादेश का जन्म भारत और पाकिस्तान का युद्ध सीधा नतीजा निकला जिसमें पाकिस्तानी सैन्य टुकड़ियों ने बिना किसी शर्त तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान में आत्मसमर्पण कर दिया था। भारतीय उपमहाद्वीप में बांग्लादेश के प्रादुर्भाव को एक महत्वपूर्ण घटना के रूप में परिभाषित किया।

भारत को पूरी पाकिस्तान मुक्त करने के लिए विवश होना पड़ा क्योंकि भारत के समक्ष उस समय सबसे बड़ा संकट एक करोड़ शरणार्थियों के सीमा पार से घुसने का था। भारतीय प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी द्वारा पाकिस्तान पर आगामी लोक के नेताओं के साथ समझौता करवाने के लिए दबाव बनाया गया लेकिन इसका कोई नतीजा नहीं निकला। 

मार्च 1972 को भारत और पाकिस्तान दोनों देशों ने मित्रता और शांति की संधि पर दस्तखत किए श्रीमती इंदिरा गांधी ने बांग्लादेश को भारत के पूर्ण सहयोग और राष्ट्रीय मैं उसे प्रवेश दिलाने का पूरा भरोसा दिलाया। इस संधि की समय सीमा 25 वर्ष की थी पाकिस्तान इस संधि पर दस्तखत करने के पश्चात भी असंतुष्ट ही था। और उसने इसे सैन्य गठबंधन का नाम दिया लेकिन संधि के प्रावधानों के अध्ययन से पता चलता है कि इसका मुख्य उद्देश्य द्विपक्षीय संबंधों को मजबूत करना तथा क्षेत्रीय शांति कायम करना और अंतरराष्ट्रीय सहयोग को बढ़ावा देना था। 

यह निश्चित तौर पर किसी देशों के समूह के खिलाफ कोई सैन्य संधि नहीं थी। उसके बाद 25 मार्च 1972 को दोनों देशों के बीच एक संक्षिप्त व्यापार समझौता किया गया इस तरह परस्पर समानता और आपसी हितों मित्रता तथा सहयोग की पृष्ठभूमि मित्रता संधि और व्यापार समझौता दोनों देशो के बीच हुआ।

गंगाजल के पर दोनों देशो के बीच दो टूक

भारत और बांग्लादेश के बीच विवाद की सबसे बड़ी समस्या गंगा नदी के जल के बंटवारे से तालुकात रखती है। यह विवाद जनवरी से मई के बीच खासतौर पर मार्च के मध्य से मध्य मई तक गंगा के पानी के बंटवारे से जुड़ा हुआ है।  जब गंगा का बहाव 55000 क्यूसेक के न्यूनतम स्तर पर पहुंच जाता है । समस्या का पूरा निचोड़ है कि अगर भारत में न्यूनतम 40000 क्यूसेक पानी अपने लिए हुगली में छोड़ता है जो कोलकाता बंदरगाह को बचाने के लिए कम से कम अनिवार्य है। 

बांग्लादेश को केवल 15000 क्यूसेक पानी ही मिल पाता है जो उसकी आवश्यकता के हिसाब से बहुत कम मात्रा में है भारत द्वारा इतनी मात्रा में पानी ले लेने से बांग्लादेश में कई स्तरों पर समस्याएं पैदा हो जाती हैं। इस प्रकार भारत और बांग्लादेश के बीच मुख्य समस्या गंगाजल के समान बंटवारे को लेकर ही है।

बंगाल और बिहार की सीमा पर भारत द्वारा गंगा नदी पर बनाया गया फरक्का बैराज कोलकाता के उत्तर में 400 किलोमीटर दूरी पर स्थित है। इस बैराज के निर्माण का मुख्य कारण कोलकाता बंदरगाह का संरक्षण और रखरखाव तथा भागीरथी और हुगली की नोगयामता को बनाए रखता था।

फरक्का बैराज के मसले को हल करने के लिए कई समझौते किए गए लेकिन इस दिशा में आखिरी समझौता दोनों सरकारों के बीच 1966 में संपन्न हुआ। शेख हसीना की सरकार ने भारत के साथ अगले 30 वर्षों तक गंगा जल के बंटवारे से संबंधित एक संधि की इस में भारत का प्रतिनिधित्व तत्कालीन प्रधानमंत्री एच डी देवगौड़ा ने किया। इस संघ की मुख्य विशेषता यह थी कि गंगा के पानी का निर्धारण 1 जनवरी से 31 मई तक की अवधि में 10 दिनों के हिसाब से 15 हिस्सों में किया जाएगा।

न्यू मुरे द्वीप की विशाल समस्या का निवारण

भारत और बांग्लादेश के बीच कुछ क्षेत्रों के स्वामित्व संबंधी विवाद भी रहे हैं। इनमें न्यू मोरे दिन विवाद,  3 गलियारे से जुड़ी समस्या और बेलोनिया सेक्टर में मोहनिया 4 में हुए संघर्ष शामिल है। इन तीनों में न्यू मुरे द्वीप विवाद अभी प्रमुख समस्या के रूप में बना हुआ है बंगाल की खाड़ी में स्थित न्यू मुरे द्वीप के अंतर्गत 2 से 12 वर्ग किलोमीटर का क्षेत्र आता है जो कि समुद्री ज्वार भाटा पर निर्भर करता है। भारत के सबसे करीबी तटीय क्षेत्र से वह करीब 5200 मीटर की दूरी पर और बांग्लादेश के तरफ से करीबन 7000  मिटर की दूरी पर स्थित है।

12 मार्च 1980 को द्वीप पर भारतीय राष्ट्रीय ध्वज फहराने के बाद से ही सारी समस्याएं उत्पन्न होते चली गई। भारत और बांग्लादेश के संबंधों पर 3 बीघा गलियारे के विवाद के चलते भी प्रतिकूल असर पड़ा है। तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी के कार्यालय के दौरान इस छोटे से भारतीय परिषद को बांग्लादेश को पट्टे पर दे दिया गया था। इस समझौते का कोई खास हल नहीं निकल पाया क्योंकि इसके लिए संवैधानिक संशोधन की जरूरत करनी पड़ती।

दोनों देशो के अनेक व महत्वपूर्ण मुद्दे

भारत र बांग्लादेश के बीच विवाद के अन्य मुद्दों में एक चकमा शरणार्थियों की समस्या भी शामिल है जिन्होंने भारत के राज्य त्रिपुरा में शरण ले रखी है। 1994 में हुई वार्ता के मुताबिक इन शरणार्थियों को त्रिपुरा से वापस बांग्लादेश की चिट्गोंग पहाड़ियों में भेज दिया गया था। और अभी भी वापसी की प्रतीक्षा कर रहे हैं। भारत के सामने एक अन्य चुनौती इस समय वे बांग्लादेशी शरणार्थी हैं जिनमें से अधिकांश गरीब तबकों से हैं और भारत के विभिन्न हिस्सों में आकर बस गए थे।

एक आकलन के अनुसार इनकी संख्या 1000000 से भी ज्यादा है जिससे भारतीय अर्थव्यवस्था पर अतिरिक्त बोझ पड़ रहा है भारत के कई बार अनुरोध के बावजूद बांग्लादेश सरकार ने वापस बुलाने के लिए कोई कदम नहीं उठा पा रही।

आजादी के समय भारत और पाकिस्तान के संबंध

भारत और कश्मीर के बीच संबंध

भारत और पाकिस्तान के बीच संबंध। 

आजादी से पहले और आजादी के बाद भी आज भी पाकिस्तान और भारत को एक अलग नजरिए से देखा जाता है। भारत के विभाजन के पश्चात भारत और पाकिस्तान के संबंधों का इतिहास कुछ विश्लेषण समस्याओं और बहुत से विवादों की समीक्षा के माध्यम से किया जा सकता है।  जिन्होंने दोनों देशों के युद्ध के दौरान और बाद में भी काफी तनावपूर्ण आक्रमक और संघर्षपूर्ण संवादों से जकड़े रखा है। प्रतिकूल संबंधों की परिणति अब तक 4 युद्धों के रूप में हो चुकी है और भारत अभी भी पाकिस्तान द्वारा कश्मीर में चलाए जा रहे उस छद्म युद्ध की चुनौती का सामना करता आ रहा है। 

भारत और पाकिस्तान के संबंधों में एक तनावपूर्ण विवाद कश्मीर समस्या भी शामिल है जिसका उद्देश्य कश्मीर को शेष भारत से अलग करना है तथा जनता की नजर में और खासकर हमारी सेनाओं की नजर में पाकिस्तान की पहचान अभी भी एक शत्रु के रूप में की जा रही है हालांकि इतिहास और संस्कृति तथा भाषा धर्म तथा भूगोल के मामले में दोनों देशों के बीच बहुत प्रकार की समानताएं हैं।

समानताएं तथा विचार बराबर ना होना। 

दोनों देशों की एक दूसरे के प्रति आस्था मति के कारण में संवाद हीनता परस्पर आशंका की स्थिति और इन आकांक्षाओं को लगातार बढ़ावा देने वाले कदमों को बनाया जा सकता है पहले पाकिस्तान की आकांक्षाओं को समझ लेना ही हमारे लिए बेहतर होगा। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस द्वारा विभाजन के विरोध के फल स्वरुप मुस्लिम लीग के समक्ष जो चुनौतियां पैदा हुई थी उसकी कड़वी स्वीकृति अभी भी पाकिस्तान के मन में समाई हुई है।

जिसका नतीजा यह हुआ कि मुस्लिम लीग अपनी आकांक्षाओं के मुताबिक भोगोलिक परिक्षेत्र में पाकिस्तान का गठन करना चाहती थी उनके इच्छा और विचारों द्वारा वह ना हो सका इतिहास की विडंबनाओ में से एक यह है कि पाकिस्तान में रहने वाले काफी समुदाय के लोग अभी भी दो राष्ट्रों के सिद्धांत से सहमत नहीं है। 

मोहम्मद अली जिन्ना और दो राष्ट्रीय सिद्धांत

पाकिस्तान के पक्ष में खड़े किए गए आंदोलन की मुख्य ताकत बंगाल और उत्तर मध्य भारत के मुस्लिम ही थे यह समर्थन भी मुस्लिम जनता की ओर से नहीं था बल्कि मुस्लिम अभिजात्य वर्ग का था मोहम्मद अली जिन्ना को तब हिंदू मुस्लिम एकता का प्रतीक माना जाता था जब तक कि महात्मा गांधी और जवाहरलाल नेहरू ने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के नेता के रूप में उनकी छवि को नुकसान पहुंचाया। 

पाकिस्तान का अभी यहीं दृष्टिकोण है कि लॉर्ड माउंटबेटन और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की मिलीभगत ने एक ऐसा पाकिस्तान बनने की राह में अवरोध पैदा किया जहां भारत की सारी मुस्लिम आबादी रहे यह कड़वाहट आज पाकिस्तानी सत्ता और उसकी संरचना की मानसिकता पर मिली हुई है। 

जम्मू कश्मीर हैदराबाद और जूनागढ़ में भारत के कठोर कदमों ने इस कटुता को बढ़ाने का ही काम किया इससे भी महत्वपूर्ण यह कि इन कदमों ने ऐसी आशंका पैदा कर दी कि भारत के विभाजन के प्रभाव को समाप्त करने के लिए पाकिस्तान की वर्तमान स्थिति को पूरी तरह नष्ट कर देगा।  चाहे उसे तोड़कर अथवा उसके सभी प्रांतों का वापस उस हिंदू योजना में मिलाकर जिसे पाकिस्तानियों ने अखंड भारत का नाम दिया था। 

सामाजिक संसाधनों के वितरण और विदेशी मुद्रा भंडार पर भारत के पक्ष में पाकिस्तान की इस आशंका को मजबूत किया कि भारत की योजनाएं विघटनकारी हैं तथा दोनों देशों के आकार आबादी और संसाधनों में विभिन्न प्रकार की आसमानता ने इन आकांक्षाओं में इंधन का काम किया।

कश्मीर विवाद

विभाजन की शुरुआत समस्या के अलावा भी पाकिस्तान की इच्छा के विपरीत जूनागढ़ हैदराबाद और कश्मीर के प्रांतों का भारत में विलय तथा रावी, सतलुज और व्यास के जल बंटवारे की समस्या भी बहुत ही महत्वपूर्ण मानी गई जिसका समाधान 19 सितंबर 1960 के दोनों देशों के बीच हुए एक शांतिपूर्ण समझौते से  सुलझ गया। 

विभाजन के दौरान कश्मीर के अंदर मुस्लिम आबादी का कुछ खास वर्चस्व देखा गया था और वहां एक हिंदू राजा महाराजा हरि सिंह का शासन स्थापित था 15 अगस्त 1947 को मिली आजादी के पहले और उसके ठीक बाद भी उन्होंने राज्य के परिग्रहण संबंधी कोई भी निर्णय नहीं लिया महाराज की योजना थी कि वह अपने राज्य को एक स्वतंत्र राष्ट्र घोषित करेंगे।

महाराजा हरि सिंह के शासन के दौरान महाराजा हरि सिंह ने एक स्वतंत्र राष्ट्र घोषित करने की घोषणा की लेकिन इसका फायदा सबसे ज्यादा पाकिस्तान ने उठाया और उसने उत्तर पश्चिमी सीमा प्रांत के कबीलाई लोगों की मदद से राज्य पर हमला बोल दिया तथा 22 अक्टूबर 1947 को किए गए इस हमले के सिर्फ 5 दिन के भीतर ही हमलावरों ने श्रीनगर से 25 मील दूर बारामुला तक आ पहुंचे। पाकिस्तान के आक्रमण से बचने के लिए महाराजा हरि सिंह ने भारत से सहायता लेने का निर्णय किया। भारत सरकार से विनती की कि राज्य की रक्षा करने के एवज में परिग्रहण के कागज पर दस्तखत करने को तैयार है।

27 अक्टूबर 1947 तक जम्मू कश्मीर के परिग्रहण की प्रक्रिया पूरी हो गई और सेना को हमलावरों से क्षेत्र खाली कराने की अनुमति दे दी गई जम्मू-कश्मीर का परी ग्रहण करने के बाद भारत ने कहा था कि राज्य को हमलावरों से खाली कराने के बाद जनता की क्या राय है इसे सुनिश्चित किया जाएगा तथा पाकिस्तान ने इस परीग्रहण को स्वीकार नहीं किया और इसे भारत का आक्रमण माना। 

उसी दौरान पाकिस्तान ने आक्रमणकारियों द्वारा कब जाएगा ए परिक्षेत्र में आजाद कश्मीर नामक सरकार की स्थापना कर दी इस मुद्दे पर भारत ने अनुच्छेद 35 के अंतर्गत सुरक्षा परिषद का दरवाजा खटखटाया वास्तव में जम्मू-कश्मीर की जनता जाने के लिए जवाहरलाल नेहरू की सरकार द्वारा जनमत संग्रह करवाने का निर्णय एक ऐसी गंभीर गलती थी पाकिस्तान जिसका फायदा उठाकर अभी तक इस विवाद को खींचने में कामयाब रहा। 

सुरक्षा परिषद ने इस मामले पर कई फैसले लिए सबसे पहले 20 जनवरी 1948 को एक तीन सदस्यीय आयोग का गठन किया गया बाद में इसका विस्तार होता रहा और इसका नामकरण किया गया भारत और पाकिस्तान के लिए संयुक्त राष्ट्रीय आयोग ने दोनों देशों के प्रतिनिधियों से मुलाकात और जांच के बाद 11 दिसंबर 1948 को अपनी रिपोर्ट साझा की इस रिपोर्ट में दोनों देशों के बीच कटुता को समाप्त करने के लिए और जनमत संग्रह के संबंध में निम्नलिखित सिफारिशें की गई सबसे पहले सिफारिश संघर्ष विराम के बाद पाकिस्तान अपनी सैन्य टुकड़ियों जम्मू कश्मीर से जल्द से जल्द हटाए तथा उन कबीलाई और पाकिस्तानी नागरिकों को वापस बुलाए जो जम्मू कश्मीर के निवासी नहीं है। 

दूसरे पाकिस्तानी टुकड़ियों द्वारा खाली किए गए क्षेत्रों का प्रशासन आयोग की देखरेख में स्थानीय अधिकारी करेंगे तथा तीसरे इन दोस्तों के पूरी हो जाने और भारत को इसकी सूचना दिए जाने के बाद वह अपनी अत्यधिक सेना टुकड़िया वहां से हटा ले आखरी सिफारिश थी कि अंतिम समझौते के अंदर भारत सीमित संख्या में वहां अपने टुकड़े स्थापित करें जो सिर्फ कानून और व्यवस्था को बनाए रखने के लिए पर्याप्त हो। 

कैसे बना कश्मीर भारत का एक अभिन्न अंग

शुरुआत के दौर में पाकिस्तान ने आनाकानी बहुत की लेकिन इन प्रस्ताव को ना चाहते हुए भी मंजूर कर लिया और दोनों देशों के सेना के प्रमुख अधिकारियों ने जनवरी 1949 को एक संघर्ष विराम पर दस्तखत किए उसके पश्चात युद्ध समाप्त हुआ और संघर्ष विराम लागू हो गया यहां यह बात ध्यान देने वाली थी कि संघर्षविराम एन उस वक्त हुआ जब भारतीय सेना ने घुसपैठियों को पूरी तरीके से बाहर खदेड़ने और पूरे राज्य को मुक्त करा पाने की स्थिति में भरपूर थी।

जिस जगह पर युद्ध समाप्त हुआ था वहीं पर संघर्षविराम रेखा जिसे आज के दौर में नियंत्रण रेखा का नाम दिया गया है उसे खींच दिया गया 27 जुलाई 1949 को कराची में संघर्ष विराम रेखा पर एक और समझौता हुआ इसके मुताबिक जम्मू कश्मीर 30,000 वर्ग मील का क्षेत्र पाकिस्तान में ही रह गया जिसे पाकिस्तान आज के दौर में आजाद कश्मीर पुकारता है इसके बाद संयुक्त राष्ट्र ने कई आयोगों का गठन किया और प्रस्ताव पारित हुए लेकिन इनमें से किसी से भी कश्मीर समस्या का हल आज तक नहीं हो पाया। 

वयस्क मतदान के आधार पर चुनी गई एक संविधान सभा ने फरवरी 6 साल 1954 को भारत सरकार द्वारा राज्य के परिग्रहण पर मुहर लगा दी। 19 नवंबर 1956 को स्वीकृत राज्य के संविधान में जम्मू कश्मीर को भारत का एक अभिन्न अंग माना गया भारत का पक्ष था कि सीधे चुनी गई कश्मीर की संविधान सभा द्वारा राज्य के परिग्रहण की अभी पुष्टि से राज्य की जनता की इच्छा का सम्मान किया गया है भारत ने इस पर ग्रहण को जनवरी 26 साल 1957 आखरी मंजूरी दे दी ।

कश्मीर मुद्दे को पाकिस्तान द्वारा कई बार संयुक्त राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मंच पर समय-समय पर कश्मीर को पाकिस्तान का अंग बनाए जाने के पीछे उसका तर्क वहां की बहु संख्या आबादी की समान धार्मिकता तथा समान विचारों वाली जनसंख्या है। पाकिस्तान के अनुसार कश्मीर में मुस्लिम धर्म के लोगों का एक विशाल समूह रहता है लेकिन भारत का मानना है कि राजनीतिक कार्य वाइयो का आधार धर्म को नहीं बनाया जा सकता।

पाकिस्तान लगातार सीमा पार आंतकवाद में संगलन है और वह कश्मीर में निर्दोष लोगों की हत्या को अंजाम दे रहा है भारत द्वारा द्विपक्षीय संबंधों को सामान्य बनाने की हरसंभव बेहतरीन प्रयासों के बावजूद पाकिस्तान राजनीतिक प्रतिशोध के चलते अब तक चार युद्ध कर चुका है। 

इस्लाम धर्म को नई राह देने वाले सर सैयद अहमद खां

Source|- Own work

सर सैयद अहमद खां, की विचारधारा इस्लाम धर्म के विकास की ओर किस प्रकार की थी. 

हिंदुस्तान में समय-समय पर समाज सुधारक को ने जन्म लिया और अपने समाज को सुधारा तथा कठिन परिश्रम और संघर्ष करके अपने समाज को एक विकसित विचारधारा की ओर धकेला, जिसके कारण हिंदुस्तानी समाज एक सही राह पर चल सके और समय के साथ अपने जीवन में परिवर्तन कर सकें।

बड़े-बड़े समाज सुधारकों में एमजी रानाडे, राजा राममोहन राय, भीमराव अंबेडकर जैसे बड़े-बड़े समाज सुधारकों ने हिंदुस्तान की सर जमीन पर जन्म लिया और अपने अपने समाज के लोगों को विकसित करने का प्रयास किया। एमजी रानाडे तथा राजा राममोहन राय ने भी पुरानी ब्राह्मणवादी विचारधाराओं का अंत किया। 

सैयद अहमद खां भी उनमें से एक थे जिन्होंने अपने इस्लाम धर्म के प्रति पूरी निष्ठा और ईमानदारी निभाते हुए इस्लाम धर्म को विकसित तथा शिक्षित करने का प्रण लिया था। सर सैयद अहमद खाँ भारतीय मुसलमानों के प्रति आधुनिक शिक्षा का प्रचार कर भारतीय मुसलमानों में राजनीतिक चेतना उजागर करना चाहते थे। 1875 में अलीगढ़ में मोहम्मडन एंग्लो ओरिएंटल कॉलेज की स्थापना अहमद खाँन के द्वारा ही की गई थी। 

अहमद खाँ और इस्लाम धर्म। 

1890 में अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के रूप में एंग्लो ओरिएंटल कॉलेज को विकसित किया गया। सैयद अहमद खाँ ही वह व्यक्ति थे जिन्होंने अलीगढ़ आंदोलन को एक ज्वलित राह दिखाँई अलीगढ़ आंदोलन का मूल उद्देश्य था। कि इस्लाम धर्म के समाज के लोगों को नई पीढी को आधुनिक शिक्षा की ओर ले कर जाना। इस आंदोलन का मूल उद्देश्य मुसलमानों में शिक्षा का प्रसार कर उनमें सामाजिक सुधार लाना तथा अपनी संस्कृति को सही रूप से चलाना।

अहमद खाँ का एंग्लो ओरिएंटल कॉलेज की स्थापना के पश्चात उनका केवल एक ही उद्देश्य रह गया था, कि इस्लाम धर्म के प्रति सामाजिक सुधार को उजागर करना तथा इस बात का भी खासतौर पर ध्यान रखाँ जाए कि उनकी इस्लाम धर्म के प्रति निष्ठा में कोई कमी ना आने पाए यह आंदोलन कुरान की उदारवादी व्याख्या पर आधारित था।

अलीगढ़ आंदोलन के अंतर्गत इस्लाम तथा आधुनिक उदारवादी संस्कृति में सभी लोग रहे तक उनमें किसी प्रकार का विरोधाभास उत्पन्न नहीं होना चाहिए अहमद खाँकर राजनीतिक चिंतन के दो भागों में विभाजित किया गया था जिनमें से पहला सन 1887 तक रहा था तथा दूसरा भाग 1887 के बाद प्रारंभ हुआ था।

इन दोनों भागो में उनके चिंतन में काफी विरोधभास  उत्पन्न हुआ प्रथम खंड की अवधि के दौरान उन्होंने हिंदू मुस्लिम एकता पर बहुत ही जोर दिया तथा विश्वास था कि धर्म को राष्ट्रवाद के मार्ग में बाधक नहीं होना चाहिए तथा इसके लिए आवश्यक है कि धर्म को राजनीति से बिल्कुल ही अलग रखा जाए। उनके मतानुसार धार्मिक तथा आध्यात्मिक मामलों का सांसारिक मामलों से किसी प्रकार का संबंध नहीं होता वायसराय की विधायिका परिषद के सदस्य के रूप में उन्होंने हिंदुओं और मुसलमानों दोनों के कल्याण के लिए प्रयास किए थे।

सर सैयद अहमद खाँ और कुरान।

सर अहमद ने कुरान शब्द का अपने शब्दों में अर्थ बताया कि जब मैं कुरान का नाम लेता हूं तो मैं हिंदू धर्म तथा मुसलमान दोनों के साथ साथ सभी धर्म को एक समान दृष्टि से देखता हूं, चाहे वह हिंदू हो मुसलमान या किसी अन्य धर्म से संबंध रखने वाला समाज।

उनके अनुसार सभी धर्म हम इसी देश में रहते हैं एक जैसा खाते हैं, तथा एक जैसा पहनते हैं और अपनी जीवनशैली इसी देश के भीतर बेहतर बनाते हैं अनेक संघर्षों के द्वारा। हिंदुओं और मुसलमानों की एकता को और मूल्यवान बनाने के लिए ही अहमद खाँ ने एम ए कॉलेज की स्थापना की थी, जिसका उद्देश्य यह था कि दोनों धर्मों के भीतर आधुनिक शिक्षा का प्रचार प्रसार करना।

एम ए कॉलेज की स्थापना के पश्चात सर अहमद ने कॉलेज के भीतर हिंदुओं शिक्षकों अध्यापकों को नियुक्त किया जिसके चलते हिंदुओं और मुसलमानों की बीच की दूरियां एकदम समाप्त होने को थी । दोनों धर्मों के प्रति सम्मान और प्यार बढ़ता जा रहा था।  हिंदुओं की भावनाओं को ठेस ना लगे, अहमद ने कॉलेज के भीतर गौ हत्या पर पूरी तरह प्रतिबंध लगा दिया, प्रतिबंध लगाने के बाद हिंदुओं के दिलों में सर अहमद के लिए और भी प्यार उजागर हो गया। 

अहमद खाँ और ब्रिटिश सरकार।

दूसरा दौर आते-आते अहमद खाँन की विचारधारा में एक बहुत ही आश्चर्यजनक बदलाव देखने को मिला, उनका बदलाव कुछ इस प्रकार का था कि वह ब्रिटिश सरकार की प्रशंसा करके हिंदुस्तानियों को इस बात का विश्वास दिलाना चाहते थे कि ब्रिटिश सरकार हिंदुस्तानी लोगों के साथ बिल्कुल सही कर रही है, तथा अगर वह ब्रिटिश सरकार के शासन में ही रहेंगे तो वही उनके लिए लाभदायक होगा। 

ब्रिटिश शासन को प्रजातांत्रिक तथा प्रगतिशील बनाने में लगे हुए थे उनकी रचनाओं में साम्राज्यवादी चिंतन की अभिव्यक्ति मिलती थी तथा उन्होंने प्रतिनिधित्व के सिद्धांतों को प्रारंभ मे तथा संसदीय सरकार की स्थापना का विरोध किया उनका मत था कि भारत में धार्मिक जातिगत तथा वर्गवत  के कारण प्रजातंत्र सही रूप से स्थापित नहीं किया जा सकता। उनको इस बात का भय सता रहा था कि अगर धार्मिक तौर पर समाज की स्थापना की जाएगी तो उनके इस्लाम धर्म के लोग कहीं पिछड़े वर्ग में ना रह जाए। 

द्वि-राष्ट्रीय सिद्धांत से चिंतित सर अहमद खाँ।

जैसे जैसे दौर  बदलता गया वैसे वैसे अहमद की विचारधारा कुछ द्विराष्ट्र सिद्धांत की ओर बढ़ती दिख रही थी। इस सिद्धांत के अनुसार हिंदू तथा मुसलमान दोनों ही दो अलग-अलग संस्कृति तथा धर्म है उनका मत था कि अगर हमें पिछड़े वर्ग की ओर रखाँ गया तो हमारा समाज कभी विकसित नहीं हो पाएगा तथा बहुसंख्यक समाज की ही स्थापना सही रूप से हो पाएगी। 

राजनीतिक तथा सामाजिक हितों में भिन्नता है तथा उनकी संस्कृति और ऐतिहासिक जन्मभूमि भी अलग-अलग है। उनका मत था कि हिंदू और मुसलमान दोनों एक साथ मिलकर कभी एक राष्ट्रीय का निर्माण नहीं कर सकते सर सैयद चुनावों तथा राजनीतिक आंदोलन के भी विरुद्ध दिखाँई पड़े क्योंकि उनका मानना था कि यह आंदोलन सरकार के विरुद्ध होगा तथा देशद्रोह के समान होगा इनके कारण ब्रिटिश सरकार उन्हें भी निष्ठावान समझेगी और मुसलमानों को इस आंदोलन से दूर रहना चाहिए।  

सर सैयद चुनाव के खिलाफ इसलिए थे क्योंकि उनके अनुसार इसके द्वारा कांग्रेस के सुशासन की स्थापना होगी जो मुस्लिम विरोधी हो सकती है तथा उन पर अत्याचार आने वाले समय में होगा बाद में सर सैयद ब्रिटिश सरकार से प्रभावित होकर कांग्रेस को समर्थन देने लगे तथा अपने समाज के लोगों को विकसित करने के लिए वह जीवन भर कांग्रेस के वफादार के रूप में कार्य करते रहे।  

वह व्यक्ति जो कभी गुलाम नहीं बना और उसके विचार

भगत सिंह के विचार सामाजिक क्रांति के प्रति किस प्रकार के थे।

भगत सिंह और उसके विचार बहुत ही भिन्न प्रकार के थे, जो आज की पीढ़ी के लोगों के भीतर बहुत ही कम देखने को मिलते हैं। भगत सिंह ने अपने पूरे जीवन में बचपन से लेकर अपने अंतिम क्षण तक उन्होंने किसी की भी गुलामी नहीं की, अब चाहे वह कोई राजनेता हो या ब्रिटिश सरकार। ब्रिटिश सरकार की ओर से भगत सिंह तथा राजगुरु और सुखदेव को भिन्न भिन्न प्रकार जेल के अंदर प्रताड़ित किया जाता था, परंतु तीनों के दिलों में कभी यहां भावना नहीं आई कि हम अपनी जान की भीख मांगे अंग्रेजी हुकूमत से।

जलियांवाला बाग हत्याकांड से आक्रोश होकर भगत सिंह, मृतकों की मिट्टी एक छोटे से कांच के डब्बे में उठा लाए थे। और अपने कमरे के भीतर शपथ ली थी कि ‘मैं कभी अंग्रेजी हुकूमत की गुलामी नहीं करूंगा’ और मेरे भारत के लोगों के साथ जो अत्याचार अंग्रेजी हुकूमत ने किए हैं उनका मैं पूर्ण हिसाब ब्रिटिश सरकार से लेकर रहूंगा। 

जलियांवाला बाग हत्याकांड के बाद भगत सिंह ने निरंतर ही अंग्रेजी सरकार को घेरना चालू कर दिया तरह-तरह के आंदोलन किए साथ ही लोगों को जागरूक किया कि अब हमें अपनी आजादी के लिए अंग्रेजी हुकूमत से लड़ाई करके ही अपना स्वराज हासिल करना होगा। बाल गंगाधर तिलक और भगत सिंह के विचार थोड़े मिलते जुलते दिखाई पड़ते थे दोनों ही अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ आंदोलन किया करते थे।

बाल गंगाधर तिलक और भगत सिंह के विचार कैसे एक थे।

बाल गंगाधर तिलक और भगत सिंह के अंदर समानता इस प्रकार से थी कि दोनों ही अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ अपनी आवाज बुलंद करना चाहते थे, और हिंदुस्तान को अंग्रेजी हुकूमत से आजादी बुलाकर स्वराज प्राप्त कर आना चाहते थे।

बाल गंगाधर तिलक ने भी अपने जीवन के भीतर अंग्रेजों से अन्य प्रकार के संघर्ष किए, उन्होंने एक स्कूल की स्थापना की जिसके भीतर भारत वासियों को यहां सिखाया जाता था कि जो फिजूल की अफवाहें अंग्रेजी हुकूमत ने हिंदुस्तानियों के दिमाग में डाली हुई है वह एकदम बकवास है और अंग्रेजी हुकूमत का षड्यंत्र है , हिंदुस्तानियों को जीवन भर के लिए गुलाम बनाने की।

ऐसी कौन सी बात थी जो अंग्रेजों ने बाल गंगाधर तिलक के काल में हिंदुस्तानियों के मन में डाली थी।

बाल गंगाधर तिलक संघर्ष तो हजारों की अंग्रेजी हुकूमत के विरुद्ध, लेकिन उन्हें काफी समय लग गया हिंदुस्तानियों को वास्तविकता से परिचित कराने के लिए। उसके पीछे यहां कारण था कि तिलक का स्वास्थ्य निरंतर ही बिगड़ता जा रहा था उन दिनों जिसके कारण बाल गंगाधर तिलक अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ सही प्रकार से अपनी आवाज बुलंद नहीं कर पा रहे थे।

ब्राह्मण परिवार से ताल्लुक रखने वाले तिलक मैं अपने जीवन में इतने बदलाव ला दिए के उनके मित्र उन्हें देखकर दंग रह गए तिलक ने 1 साल के भीतर ही योग तथा कसरत के द्वारा अपनी खांसी और अपना स्वास्थ पूरी तरह से स्वस्थ कर लिया।

अपना स्वास्थ सही होने के पश्चात तिलक ने अपने मित्रों के साथ शपथ ली के, अंग्रेजों द्वारा फैलाई गई झूठी अफवाहों को हिंदुस्तानियों के दिल और दिमाग में से सदैव के लिए निकाल कर फेंक देना है। और हिंदुस्तानियों को स्वराज और हिंदुस्तान की पूर्ण आजादी के प्रति जागरूक करना है। अंग्रेजों द्वारा फैलाई गई वह यहां थी कि,  कि अंग्रेजी हुकूमत जो भारतवासियों के ऊपर आकर बैठी हुई है।

अंग्रेजी हुकूमत कोई वर्चस्व या तानाशाही नहीं है,बल्कि भगवान की देन है हिंदुस्तानियों के लिए। अंग्रेजों की इस अनैतिक अफवाहों का शिकार लाखों हिंदुस्तानी कई वर्षों से होते आ रहे थे। जिसके चलते वह पूरी तरह गुलाम बन चुके थे तथा उन्हें आजादी की कोई आवश्यकता नहीं थी उनके भीतर कोई जागरूकता और आक्रोश विचारधारा अब नहीं बची थी, तथा उन्हें गुलामी की आदत पड़ चुकी थी। 

भगत सिंह के विचार।

भगत सिंह के विचार मार्क्सवादी तथा रूसी वादी साम्यवाद से कुछ अत्यधिक ही प्रभावित थे। भगत सिंह क्रांति को ही सबसे बड़ी विचारधारा के रूप में प्रकट करते थे और उनका मानना था कि क्रांति के भीतर हिंसा की कोई भी जगह नहीं है।  क्रांति न्याय के आधार पर एक ऐसी सामाजिक व्यवस्था होती है जिसके द्वारा हम अपने समाज के भीतर बदलाव ला सकते हैं।

भगत सिंह नास्तिक होने के साथ-साथ एक समाज सुधारक भी थे।

समाज में फैली विषमताओं और जातिवाद को भगत सिंह , हिंदुस्तान के लिए दुर्भाग्यपूर्ण मांगते थे। उनका मानना था कि जिस समाज में अनेक प्रकार के धर्म के लोग पलायन करते हैं तथा अपना जीवन व्यतीत करते हैं उस समाज के अंदर किसी भी प्रकार का जातिवाद तथा भेदभाव अनैतिक है।

भगत सिंह के अनुसार असमानता तथा विषमताओं को समाज से उखाड़ कर फेंक देना चाहिए तथा संसाधनों को सभी को चाहे वह मजदूर हो या किसान उन्हें एक समान अधिकार ही प्राप्त होने चाहिए। भगत सिंह का विश्वास था कि शोषक समाज के तहत विश्व शांति की बात करना अकल्पनीय तथा पाखंड पूर्ण है वह स्वतंत्रता की भांति क्रांति को भी लोगों का जन्मसिद्ध अधिकार मानते थे।

सिंह के विचार हिंसा के प्रति।

भगत सिंह ने अपने पूरे जीवन काल में हिंसा का समर्थन कभी नहीं किया उनका मानना था कि अगर आप किसी चीज के प्रति आंदोलन करते हैं या क्रांति की शुरुआत करते हैं तो उसके भीतर हिंसा को बिल्कुल भी ध्यान नहीं देना चाहिए। लेकिन दूसरी ओर भगत सिंह चाहते थे कि हिंसक क्रांति से एक ऐसे समाज का निर्माण होना चाहिए जहां हिंसक समाप्त कर दी जाए और, और समाज का इस प्रकार से पुनर्निर्माण होना चाहिए जहां पर धर्मनिरपेक्षता और व्यक्तिगत अधिकारों की सुरक्षा प्रदान की जाए।

भगत सिंह के विचार अपराधी के प्रति।

अपराध तथा दंड जैसे मामलों पर भी विचार प्रकट करते हुए भगत सिंह ने लिखा कि अपराधी को दंड उसका पुनर्वास करने के विचार से ही दिया जाना चाहिए, उनके अनुसार जेलों के भीतर सुधार ग्रह होने चाहिए जिनके द्वारा व्यक्ति को सुधारने का मौका दिया जाना चाहिए ना कि उनकी जिंदगी नर्क बनानी चाहिए।

भगत सिंह मानते थे कि युद्ध शोषण के आधार पर चलने वाले समाज की विशेषता है। समाजवादी समाज में युद्ध की संभावना को नकारा नहीं जा सकता क्योंकि यह पूंजीवादी समाज से उसकी रक्षा के लिए आवश्यक होगा तथा क्रांतिकारी युद्ध की समाजवादी व्यवस्था के निर्माण के लिए भी अति आवश्यक होगा। भगत सिंह का मत था कि सत्ता हथियाने के बाद शांतिपूर्ण तरीकों का प्रयोग रचनात्मक कार्यों के लिए किया जाना चाहिए लेकिन रुकावट को रोकने के लिए ताकत का प्रयोग अति आवश्यक है।

अकबर और राजपूतों के बीच संबंध मुग़ल काल के दौर में

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मोहम्मद जलालुद्दीन अकबर और राजपूतों के बीच संबंध।

मुगल काल के दौरान जलालुद्दीन अकबर और राजपूतों के बीच संबंध कुछ अच्छे नहीं थेजिनके पीछे अनेक कारण माने जाते हैं । अकबर ने सदैव ही राजपूतों का वर्चस्व  घटाने की सोची , जिसके चलते राजपूतों और अकबर के बीच इतिहास में अनेकों बार युद्ध देखने को मिले थे ।

1560 ईस्वी में जब मोहम्मद जलालुद्दीन अकबर अपने सिंहासन पर बैठे उस समय राजपूतों वर्चस्व कुछ कम नहीं था । राजपूतों के साथ अकबर के संबंधों को देश के शक्तिशाली राजाओं और जागीरदारों के प्रति मुगल नीति की पृष्ठभूमि में देखा जा सकता था।

अकबर के राज गद्दी संभालने के दौरान मुगल काल में राजपूतों के अधीन आने वाली बहुत सी रियासतें थी जिनको अकबर हासिल करना चाहता था राजपूतों से अपने संबंध बनाकर। आमेर, मेवाड़, बीकानेर, जैसलमेर रणथंबोर ऐसी बहुत सी रियासतें थी जिन्हें अकबर हासिल करना चाहता था।

मोहम्मद अकबर का स्वभाव मुगल काल के दौरान।

हल्दीघाटी युद्ध के दौरान भी महाराणा प्रताप और मोहम्मद जलालुद्दीन अकबर के बीच जो युद्ध इतिहास में दर्ज किया गया है उसमें भी बताया जाता है कि अकबर बेशक महाराणा प्रताप को परास्त करना चाहता था, जो अकबर कर नहीं पाया इतिहास में कभी भी, लेकिन इसके साथ साथ यह भी बताया जाता है कि मोहम्मद जलालुद्दीन अकबर का स्वभाव राजपूतों के प्रति बहुत ही सद्भावना मित्रता की और था। 

अकबर एक महान कूटनीतिज्ञ दूरदर्शी तथा महत्वकांक्षी सम्राट मुगल काल में माना जाता है। अकबर एक महान सम्राट होने के साथ-साथ चतुर व्यक्ति भी था। अकबर भली-भांति जानता था कि अगर वह राजपूतों से दुश्मनी मोल लेगा तो उसे हार का सामना भी करना पड़ सकता था ।

अकबर जीवन में राजपूतों के ऊपर अपना वर्चस्व कायम नहीं कर पाया । मुगल काल के दौरान हिंदू रियासतों में राजपूत प्रमुख थे, तथा अकबर को यह ज्ञात था कि राजपूतों को शत्रु बनाकर स्थाई और शांतिपूर्ण शासन में कभी भी कायम नहीं कर सकता। 

राजपूत एक बहुत ही शक्तिशाली वीर असाधारण योद्धा तथा बहुत ही विकट सेनानी थे उनके भीतर बलिदान, स्वामी भक्ति, सच्चाई जैसे गुण कूट-कूट भरे हुए थे। राजपूतों का इतिहास भी भारत के इतिहास में एक अलग ही भूमिका निभाता है जिसमें हमें यह देखने को मिलता था कि राजपूत एक बहुत ही शक्तिशाली समुदाय था और अपनी जान को जोखिम में डालकर अपने साम्राज्य की सुरक्षा करना ही उनके लिए पहला मूल कर्तव्य था।

अन्य धर्मों के साथ इस्लाम धर्म में संबंध गहरे करना।

राजपूतों के साथ मुगल काल में जब अकबर ने अपने संबंध गहरे और शक्तिशाली कर लिए उसी दौरान अकबर ने राजपूतों की राजकुमारियों के साथ विवाह किए थे। अपनी हिंदू पत्नियों को जलालुद्दीन अकबर ने पूरी तरह से स्वतंत्रता प्रदान की थी। अकबर अपने हिंदू पत्नियों का सम्मान करना आरंभ कर दिया था और उन्हें धार्मिक स्वतंत्रता से जीने का अधिकार भी प्रदान कर दिया था।

वैवाहिक संबंध स्थापित करने के साथ-साथ अकबर ने राजपूतों के साथ और भी संबंध अपने घनिष्ट बनाया जिसके भीतर अकबर ने राजपूतों को दरबार में सम्मानजनक तथा उच्च स्तर के पद दिए। अपने दरबार में राजपूतों को सम्मानजनक पद देने के पश्चात अकबर ने इस्लाम धर्म अपनाने पर मजबूर किए जाने वाली प्रतिक्रियाओं से भी नाता तोड़ दिया तथा आदेश जारी करवाया कि जो अपने धर्म में स्वतंत्र रूप से रहना चाहता है वह रह सकता है। 

राजपूतों को एक सम्मानजनक पद प्रदान करना।

पढ़ने राजपूतों को मनसब और उच्च पद प्रदान की मुगल काल के दौरान तथा आमेर के राजा भारमल को काफी ही ऊंचे स्तर का पद प्राप्त हुआ। भगवान दास जोकि राजा भारमल का पुत्र था उन्हें पांच हजारी मनसब तक पहुंचा तथा पुत्र मानसिंह सात हजारी तक।

राजा मानसिंह को बिहार और बंगाल का गवर्नर नियुक्त कर दिया गया था। राजा टोडरमल और बिहारीमल को भी गैर सैनिक तथा सैनिक पदों पर नियुक्त किया। मानसिंह और बिहारीमल को ऊंचे पद देने के बाद मोहम्मद जलालुद्दीन अकबर ने बचे हुए राजपूतों को भी सर्वोच्च अधिकारी नियुक्त किया था।

समाज में फैली त्रुटियों को नष्ट करना। 

अकबर को बहुत ही आधुनिक सम्राट माना जाता है। अकबर ने अपने मुगल काल के दौरान अपने समाज के भीतर से बहुत सी पुरानी प्रथाओं का भी प्रचलन पूरी तरह बंद कर दिया था। जिसके भीतर सामाजिक बुराइयां कूट-कूट के भरी हुई थी। सती प्रथा और बाल विवाह जैसी क्रूर प्रथा का भी अकबर ने सर्वनाश कर दिया, और आदेश जारी किया कि अगर इन प्रथाओं पर कोई अमल करता पाया गया तो वह कानूनी रूप से दोषी माना जाएगा। 

धार्मिक स्वतंत्रता भी अकबर ने अपने साम्राज्य के लोगों को प्रदान की सभी सैनिक राजपूत अधिकारियों और राजनैतिक अधिकारियों को पूर्ण धार्मिक स्वतंत्रता अकबर के द्वारा प्रदान की गई साथ ही साथ सभी रीति-रिवाजों को अपनी परंपरा के अनुसार ही मानने का आदेश दिया।

अकबर ने अन्य धर्मों के लोगों के लिए मंदिर का निर्माण किया और उनमें हिंदू पुजारियों को नियुक्त किया। मोहम्मद जलालुद्दीन अकबर अपनी महानता के लिए इसलिए भी जाने जाते थे कि जब उन्होंने राजपूतों से संबंध गहरे करने का विचार बनाया उसी समय अकबर ने जजिया कर को समाप्त कर दिया और गाय का मांस खाने पर पूरी तरह रोक लगा दी।

अकबर का युद्ध राजपूतों से।

मुगल काल में अकबर ने जिन राजपूतों से संबंध विशेष बनाए थे उसी के साथ साथ बहुत से राजपूतों ने अकबर के प्रस्ताव को ठुकरा दिया , जिसके चलते अकबर और अन्य राजपूतों के साथ युद्ध का आरंभ हुआ। अकबर ने केवल उन्हीं राजपूतों से युद्ध किया जिन्होंने उसका संधि प्रस्ताव ठुकरा दिया ।

रणथंबोर, कालिंजर और मेवाड़ के शासकों के साथ ही जलालुद्दीन अकबर ने युद्ध आरंभ किया। अकबर ने वैवाहिक संबंधों को शर्त के तौर पर नहीं रखा रणथंबोर के हांडाओ के साथ अकबर के वैवाहिक संबंध कुछ अच्छे नहीं थे।

मुगल काल और अकबर की वास्तविकता अन्य धर्मो के प्रति

मुगल साम्राज्य में सभी धर्मों की वास्तविकता किस प्रकार थी

मुगल शासकों की अपनी कोई खास धार्मिक नीति नहीं थी, परंतु मुगल काल के सम्राट व्यक्तिगत दृष्टिकोण तथा अपने विचारों पर ही उनकी नीति निर्भर किया करती थी। मुगल काल के दौरान मुगल शासकों की दृष्टि धर्म और धार्मिक समुदाय के प्रति कुछ अलग प्रकार की थी। 

इतिहास में हमें बताया जाता है कि कैसे मुगल शासकों ने अन्य धर्म के लोगों को प्रताड़ित कर उन्हें मौत के घाट उतार दिया गया था, लेकिन हमें यह नहीं बताया जाता कि कुछ मुगल शासक सभी धार्मिक विचार धाराओं का सम्मान किया करते थे तथा अपने शासन में सभी को स्वतंत्र रूप से जीवन जीने का अधिकार प्रदान किया करते थे।

मोहम्मद जलालुद्दीन अकबर की विचारधारा अन्य धर्मों के प्रति किस प्रकार की थी?

मुगल काल का आरंभ बाबर के द्वारा सन 1526 में शुरू हो गया था। बाबर ने इब्राहिम लोदी को पराजित कर अपना शासन कायम किया था। समय बदलता गया और लोगों की विचारधारा भी बदल दी गई, साल 1560 आते आते मुगल शासकों की विचारधारा अनेक धर्मों के प्रति बहुत ही सरल और दयालु हो गई थी। मोहम्मद जलालुद्दीन अकबर भी उन्हीं मुगल शासकों में से आते हैं जिनके नेतृत्व में उनकी सेना तथा उनके साम्राज्य के लोग पूरी तरह अपने साम्राज्य में आजादी से रहे। जलालुद्दीन अकबर के शासन में किसी भी प्रकार का जातिगत तथा धार्मिक भेदभाव नहीं किया गया। 

1560-65 के बीच अकबर ने सत्ता संभालते ही सभी धर्म से संबंधित अनेक अनेक प्रकार के निर्णय लिए। अकबर के द्वारा किए गए अनेक कार्यों से उनका धार्मिक दृष्टिकोण स्पष्ट रूप से दिखाई पड़ता था। अपने शासनकाल में अकबर ने राजपूतों से वैवाहिक संबंध स्थापित किए तीर्थ यात्रा पर लगाया जाने वाला कर जलालुद्दीन अकबर के द्वारा हटा दिया गया। युद्ध के दौरान परास्त हुए सैनिकों और आम जनता पर इस्लाम धर्म अपनाने पर मोहम्मद जलालुद्दीन अकबर ने पूरी तरह रोक लगा दी। आपस में जो लेनदेन की प्रक्रिया बनाई गई थी जिसे जजिया का नाम दिया गया था। अकबर के द्वारा वस्तुओं पर लगाया हुआ कर भी समाप्त कर दिया गया जिसे मुगल काल में जजिया कर के नाम से जाना जाता था। 

अकबर के अलग-अलग बौद्धिक प्रभावों और भरण-पोषण ने उसके व्यक्तिगत विचारों को परिवर्तित करने में बहुत ही अहम भूमिका निभाई थी। उदारवादी दृष्टिकोण को आडंबरपूर्ण कहा गया था। अविश्वसनीय मुस्लिम समर्थन के अभाव में अकबर के पास राजपूतों और भारतीय मुसलमान के साथ संधि करने के अलावा और कोई चारा नहीं बचा था। उन सब के पीछे राजनीतिक उद्देश्य को उनका कारण बताया गया है।

अकबर के धार्मिक विचारों में बदलाव।

साल 1565 ईसा पूर्व के पश्चात अकबर के दिमाग में धर्म को लेकर उसके दृष्टिकोण में महत्वपूर्ण बदलाव देखने को मिला। अकबर के वकील मुनीम खाने एक दस्तावेज 1566 पर हस्ताक्षर किए, उस दस्तावेज के भीतर आगरा के आसपास के इलाके से जजिया कर वसूल करने का आदेश था। अकबर ने राजपूतों के खिलाफ लड़े गए युद्ध को जेहाद कहा, मंदिर तोड़कर और काफी लोगों को मारकर उसे गौरवान्वित महसूस हुआ।

उस्मानी के अनुसार, सम्राट अकबर ने बिलग्राम के काजी अब्दुल समद को उनके साम्राज्य के आसपास के हिंदुओं के द्वारा की जाने वाली मूर्ति पूजा रोकने का आदेश भी जारी कर दिया था। सन 1574 में अकबर के पुत्रों का प्रचलन हुआ, प्रचलन होने के पश्चात अकबर की विचारधारा में बहुत से बदलाव देखने को मिले।

1575

1575 ईसवी में अकबर ने फतेहपुर सीकरी में इबादत खाना बनवाया था, साथ ही साथ इस्लाम धर्म सिद्धांत के विभिन्न मुद्दों पर मुक्त बहस करने के लिए इस इबादत खाने की स्थापना की गई थी। शुरुआती दौर में केवल सुन्नियों को ही इस बहस में हिस्सा लेने का मौका मिला था, सितंबर 1578 ईस्वी में सम्राट ने सूफियों ब्राह्मणों, जैन, ईसाइयों, यहूदियों तथा पारसियों और अनेक प्रकार के धर्म के व्यक्तियों के लिए विवादित खाने के द्वार खोल दिए थे।

मुजाहिद और इमाम आदिल खुद को घोषित करने के बाद अकबर ने सभी धार्मिक मसलों पर उलेमा के बीच के मतभेदों को निपटाने और मत व्यक्त करने का अधिकार प्राप्त करने का दावा किया था। मुगल साम्राज्य के एक समुदाय ने इसका बहुत ही जोरदार विरोध किया लेकिन अंत में अकबर ने कट्टरपंथियों को दबाने में पूरी तरह सफलता हासिल कर ली थी। 1579 ईस्वी में मोहम्मद जलालुद्दीन अकबर ने ‘महजरनामा’ की घोषणा कर दी थी और 1582 ईस्वी में अकबर के द्वारा दिन ए इलाही नामक नया धर्म चलाया जिसे प्रारंभ में तोहिद ए इलाही कहा जाता था।

बाबर का मुग़ल शासन हिंदुस्तान में और लोदी वंश

बाबर और मुग़ल शासन हिंदुस्तान में
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भारत में बाबर और मुग़ल शासन की स्थापना कैसे हुई ?

पानीपत की पहली लड़ाई के बाद ही मुग़ल शासन और बाबर ने अपने कदम भारत में रखे। 1526 के दौरान दिल्ली सल्तनत के लोदी( इब्राहिम लोदी) वंश के खात्मे के बाद भारत के भीतर मुग़ल शासन की नीव रखी गयी। मुग़ल वंश के संस्थापक “जहीरुदीन मोहम्मद बाबर” थे। बाबर के पिता उमर शेख मिर्ज़ा, फरगना के शासक रहे थे, जिनकी मृत्यु के बाद ही बाबर अपने राज्य का पूर्ण अधिकारी बना।

बाबर अपने पारिवारिक तंगी के चलते अपने पिता के राज्य पर पूरी तरह शासन नहीं कर सका। बाबर ने केवल 22 वर्ष की आयु में काबुल पर अधिकार जमाकर अफगानिस्तान पर अपना अधिकार कायम कर लिया। बाबर 22 वर्ष तक काबुल में रहते हुए भी अपने पेत्रक राज्य फरगना और समरकन्द को प्राप्त करने मे असफल रहा। कामयाबी ना मिलने पर बाबर ने अपने कदम भारत की और रखे, और भारत में अपना शासन बड़ाने का विचार किया।   

ऐसे कौन से कारण थे, जिसके चलते बाबर ने भारत की भूमि पर आक्रमण करने का विचार बनाया ?

भारत की उस समय की दशा कुछ सही नहीं थी , धार्मिक गतिविधियो को देखते हुए बाबर ने भारत के उपर शासन करने की सोची, क्यूकी भारत की तत्कालीन राजनीति मे एकता और मजबूती का अभाव था। हिन्दू और मुसलमान, तथा मुसलमान ही आपस में एक दूसरे के विरुद्ध हो चुके थे। अफगानी भी एक दुसरे के खिलाफ हो चुके थे। अखंडता के कारण ही बाबर ने अनुमान लगा कर भारत पर शासन करने का विचार बना लिया था। बाबर भली भाति जानता था की , भारत के भीतर अभी कुछ भी मजबूती नहीं है और सामाजिक रूप से भी लोगो के बीच दूरिया बनी हुई है।

सब घटना क्रम को देखते हुए बाबर ने अनुमान लगा लिया था की भारत ऐसी स्थिति ने नहीं है, ना ही उसके पास शक्ति है, के भारत निश्चित समय के अनुसार कूटनीति के द्वारा एक विशाल साम्राज्य की नीव रख सके। इन सब बातों को ध्यान रखते हुए बाबर ने भारत पर आक्रमण करने की सोची।  

दौलत खान और लोदी वंश

पंजाब के सूबेदार दौलत खाँ और लोदीवंश अथवा इब्राहिम लोदीके चाचा आलम खाँ ने ही बाबर को भारत पर आक्रमण करने की चुनौती दी। बाबर के पंजाब मे कदम रखने के बाद राणा संग्राम सिंह ने भी इब्राहिम लोदी के विरुद्ध, बाबर को सहायता देने का विश्वास दिलाया। सभी आक्रमण ने बाबर को भारत पर आक्रमण करने के लिए उत्साहित किया।

काबुल से सही आय प्राप्त ना होना

बाबर ने किसी प्रकार काबुल पर अपना शासन कायम तो कर लिया था, बरहाल बाबर की आर्थिक स्थिति कुछ सही नहीं थी। भारत का विशाल क्षेत्र और विशाल धन दौलत को देखते हुए बाबर के मन में लालसा जागी जिसके चलते बाबर ने भारत पर आक्रमण किया। काबुल की आर्थिक स्थिति इतनी मजबूत नहीं थी की वह उसकी आय से अपनी सेना का भरण पोषण सही रूप से कर सके।  

उजबेग जाति के खात्मे से चिंतित “बाबर”

बाबर काबुल में वह शक्तिशाली मध्य एशिया की उजबेग जाति के लोगो के ऊपर मँडराता हुआ खतरा बाबर को सता रहा था। बाबर एक बहुत ही विशाल और सुरक्षित राज्य की नीव रखना चाहता था। बाबर उजबेग जाति के समुदाय की सुरक्षा को देखते हुए भारत जैसे विशाल देश पर अपना अधिकार कायम करना चाहता था।

टुकड़ो में बिखरा हुआ भारत  

भारत को टुकड़ो में बिखरा हुआ देख, बाबर ने अनुमान लगा लिया था, की जिस स्थिति में भारत तात्कालिक रूप में है ,उस स्थिति में भारत, बाबर की सेना का सामना नही कर पाएगा और बाबर आसानी से अपना अधिकार भारत के ऊपर कायम कर पाएगा।

भारत उस समय पूरी  तरह से खंडित हो चुका था, भारत के अंदर अनेक छोटे छोटे राज्य बने हुए थे। भारत के भीतर कोई भी शक्तिशाली और मजबूत राजनीति तथा कोई शासक नहीं था जो बाबर को युद्ध मे असफल कर सके।

बाबर की असफलता

बाबर की अपनी सत्ता के विस्तार के बड़े सपने देखने के बाद, भारत के ऊपर आक्रमण करने का एक और कारण था। बाबर भली भाति इस बात से अवगत था की , जिस प्रकार बाबर ने अपनी सेना का विस्तार किया हुआ था, उसकी सेना उसको भारत के उपर उसका अधिकार कायम करने में जरूर सफलता दिलाएगी। बाबर फरगना का शासक होते हुए समरकन्द को हासिल करना चाहता था। बाबर को समरकन्द हासिल करते समय असफलता का सामना करना था, जिसके चलते उसने फरगना का भी अधिकार खो दिया था। फरगना का अधिकार खोने के पश्चात बाबर ने काबुल पर विजय हासिल कर अपना शासन कायम रखा।

14 वर्षो की कड़ी मेहनत करने के बाद भी बाबर फरगना और समरकन्द को हासिल ना कर सका। असफलता को झेलते हुए बाबर की नजर भारत की ओर पड़ी, उसने भारत पर अपना अधिकार कायम करने का रुख बनाया।

अकबर के शासन का सूर्योदय और पानीपत की दूसरी लड़ाई

दिल्ली के सम्राट का अंत और जलालुद्दीन अकबर के शासन का सूर्योदय

जैसा कि इतिहास में निरंतर शब्दों में प्रस्तुत किया जाता है कि पानीपत की जमीन पर तीन घमासान लड़ाइयां हुई, और मुगल साम्राज्य के सम्राटों ने जिस में बाबर हुमायूं तथा उनके पुत्र अकबर का नाम मलिक किया गया है।

पानीपत की दूसरी लड़ाई का भी एक अलग किस्म का ऐतिहासिक किस्सा है माना जाता है कि हुमायूं की मृत्यु के बाद अकबर बिल्कुल अकेला पड़ गया था और उसकी कम उम्र होने के कारण अकबर के साम्राज्य तथा उसके संरक्षक को समझ नहीं आ रहा था कि अब हम अपने सम्राट का चयन किस प्रकार करें इसके पीछे कारण यह था कि अकबर की उम्र केवल 13 साल की थी। अकबर अभी सिंहासन संभालने के योग्य नहीं था क्योंकि वह एक छोटा बच्चा ही था।

हुमायूं की मृत्यु 24 जनवरी 1556 को हुई। पिता की मृत्यु के समय अकबर केवल 13 साल के एक छोटे बच्चे थे लेकिन सब कुछ अस्त-व्यस्त के कारण अकबर को दिल्ली का सिंहासन सौंप दिया गया। सिंहासन सौंपने के बाद भी अकबर काबुल तथा गांधार और दिल्ली के कुछ सीमित हिस्सों तक ही अपना शासन कायम करने योग्य था

बैरम खाँ कौन था ?

बैरम खाँ हुमायूं तथा अकबर के दौर का संरक्षक था, किसी भी युद्ध तथा किले में किसी भी प्रकार की सुरक्षा बैरम खाँ के द्वारा ही निश्चित किया जाता था तथा अकबर और हुमायूं के वफादार के रूप में बैरम खाँ को इतिहास में जाना जाता है। हुमायूं की मृत्यु के बाद सारी जिम्मेदारी बैरम खाँ के सिर पर आ पड़ी अकबर की उम्र केवल 13 वर्ष की होने के कारण बैरम खाँ ने उसका रखरखाव किया तथा उसका राज्याभिषेक होने के बाद भी उसे युद्ध में जाने तथा किले से बाहर निकलने की अनुमति बिल्कुल भी नहीं दी गई।

बैरम खाँ ने अकबर के बड़े होने तक अकबर को 5 हजार सैनिको के एक सुरक्षित गोलार्ध में रखा। अकबर को अपनी कम उम्र में युद्ध में हिस्सा लेने की अनुमति भी बैरम खाँ से लेनी पड़ती थी लेकिन बैरम खाँ अकबर की आयु को देखकर उसे कदापि आज्ञा नहीं देता था।

म्यान से निकली तलवार को इस बात का ज्ञान नहीं होता की उसका इस्तेमाल किस धर्म के व्यक्ति विशेष के लिए किया जाएगा

हेमचंद्र विक्रमादित्य उर्फ हेमू

हेमचंद्र विक्रमादित्य उर्फ हेमू

हेमचंद्र विक्रमादित्य उर्फ हेमू हरियाणा के रेवाड़ी क्षेत्र के निवासी थे, उन्होंने अपने जीवन में लगभग 22 युद्ध जीते थे तथा अनुभवी सम्राटों को पराजित किया था। विक्रमादित्य उर्फ हेमू अपने साहस और अपनी महानता के लिए इतिहास में अपना नाम दर्ज करा चुके हैं।

हेमचंद्र विक्रमादित्य दिल्ली के आखिरी सम्राट थे जोकि अकबर के शासन से पहले का वक्त था। हेमचंद्र विक्रमादित्य नमक के व्यापार में बहुत ही निपुण थे तथा पश्चिमी तट से लगने वाले सभी साम्राज्य के सम्राट उनसे अपना आयात निर्यात तथा संबंध मधुर किस्म के रखा करते थे।

पानीपत की दूसरी लड़ाई

हुमायूं की मृत्यु के पश्चात हेमू को जैसे ही हिमायू की जानकारी मिली तो उन्होंने सोचा कि मैं अब पूरी तरह आजाद हूं तथा पूरे भारत पर अपना कब्जा जमा सकता हूं लेकिन हेमचंद्र का यह सोचना कुछ प्रकार तक सही साबित नहीं हुआ।

हेमू ने अपनी सेना को बढ़ाने का प्रयास किया तथा अफगानों से मदद भी मांगी तथा उन्होंने आगरा और अन्य स्थानों पर भी युद्ध का आरंभ कर दिया कई स्थानों से हेमू की सेना ने अकबर तथा हुमायूं की सेना को खदेड़ कर रख दिया जिसका कारण पानीपत का दूसरा युद्ध बना।

पानीपत की दूसरी लड़ाई का आरंभ

पानीपत की दूसरी लड़ाई इतिहास में दिल्ली के राजा विक्रमादित्य उर्फ हेमू और जलालुद्दीन अकबर के बीच हुई घमासान युद्ध की याद है। जलालुद्दीन अकबर एक रोज काबुल में अपने शासन का चुनाव प्रचार कर रहे थे उसी क्षण अकबर की नजर दिल्ली की और पड़ी और उसके मन में आया कि मुझे अपना शासन दिल्ली में पूरी तरह से विस्तृत करना है ताकि मैं पूर्ण साम्राज्य का सम्राट बन जाऊं।

अकबर के पास बहुत ही अनुभवी सेना तथा घुड़सवार और कई हजार हाथियों की संख्या थी। हेमचंद्र विक्रमादित्य के पास बहुत ही सीमित सैनिकों की संख्या थी अकबर के मुकाबले तथा अफगान के शासकों ने भी हेमचंद्र विक्रमादित्य का साथ पानीपत की दूसरी लड़ाई मे दिया, जिसके कारण हेमचंद्र विक्रमादित्य की सेना का मनोबल सातवें आसमान पर पहुंच गया और उन्होंने अकबर की सेना का डटकर सामना किया।

जलालुद्दीन अकबर और हेमचंद्र विक्रमादित्य आमने-सामने

राजा हेमचंद्र उर्फ हेमू ने अकबर की सेना का सामना बहुत खूब तरीके से कर रहे थे लेकिन ना जाने कहां से अचानक एक उड़ता हुआ तीर आकर सीधा हेमचंद्र की आंखों में लग गया जिसके कारण उन्हें बहुत ही क्षति पहुंची, उन्हें साफ दिखना भी बंद हो गया लेकिन हेमू ने हिम्मत नहीं हारी उन्होंने अपने साहस को दिखाते हुए अपनी घायल आंख से जब तक उनसे युद्ध में लड़ा गया उन्होंने अपनी जी जान लगा दी।

लेकिन एक घायल राजा अपनी एक आंख को लेकर कब तक लड़ता कुछ क्षण बाद हेमचंद्र अचानक जमीन पर गिर पड़े और बेहोश हो गए । हेमू को घायल देखकर उनकी सेना अचानक सेना घबरा गई और उन्होंने अपना मनोबल तोड़ दिया और उनकी सेना के बीच भगदड़ मच गई जिसके कारण अकबर की सेना ने हेमचंद्र की सेना के सैनिकों को बुरी तरह से रोंद कर रख दिया और उनका वध कर दिया तथा सभी के सर कलम कर दिए गए।

सम्राट होने का अर्थ यह नहीं कि आप धार्मिक आधार पर किसी की आजादी का हनन करें। सभी को साम्राज्य में धार्मिक आजादी प्राप्त होनी चाहिए

मोहम्मद जलालुद्दीन अकबर

अकबर के सामने घायल हेमू की पेशी

पानीपत की जमीन पर युद्ध हारने के बाद अकबर के घायल सैनिक हेमचंद्र विक्रमादित्य को पकड़कर अकबर के कदमों में लाकर पटक देते हैं तथा बैरम खाँ भी वहीं पर मौजूद होता है जो हुमायूं तथा अकबर का संरक्षक के रूप में कार्यरत था।

बैरम खाँ बहुत ही क्रूर तथा निर्दई इंसान माना गया है इतिहास में, जैसे ही वह घायल हेमू को अकबर के कदमों में पड़ा हुआ देखता है उसका खून खौल उठता है तथा वह अपने सम्राट अकबर से कहता है सम्राट इंतजार करें बिना इस हेमचंद्र विक्रमादित्य का सर कलम कर दीजिए।

अकबर अपनी म्यान में से तलवार निकालकर हेमचंद्र विक्रमादित्य की ओर बढ़ते हैं तथा उसकी गर्दन पर तलवार रख कर उसका सर उठाते हैं अकबर देखते हैं कि हेमचंद्र विक्रमादित्य की एक आंख पूरी तरह घायल है तथा वह अधमरा की स्थिति में अभी है अकबर पलटते हुए बैरम खाँ से कहता है खाँ चाचा चाहे मैं कितना भी बड़ा सम्राट बन जाऊं लेकिन मैं कभी घायल इंसान पर अपना जोर नहीं दिखा सकता।

अकबर का दयालु स्वभाव देखकर बैरम खाँ गुस्से से लाल हो जाता है तथा अकबर से कहता है सम्राट इसी राजा ने आपके साम्राज्य को खंडित करने का प्रयास किया था और आप इसके बारे में ही ऐसी दयालुता दिखाएंगे तो यह उचित नहीं है आप तुरंत अपनी तलवार से इसका सर कलम कर दीजिए आसपास खड़े सैनिकों ने भी बैरम खाँ की बात का समर्थन किया लेकिन अकबर ने ऐसा करने से मना कर दिया फिर गुस्साए बैरम खाँ ने अपने म्यान में से तलवार निकालकर राजा विक्रमादित्य उर्फ हेमू का सर एक ही बार में धड़ से अलग कर दिया, और यहां हेमू का अंत हो जाता है।

हेमचंद्र विक्रमादित्य की मृत्यु के पश्चात

जैसे ही हेमू की सेना हेमचंद्र को घायल देखती है सारी सेना तितर-बितर हो भागने लगती है इसी बात का फायदा उठाकर अकबर की सेना हेमचंद्र विक्रमादित्य की सेना के सैनिकों का सर धड़ से अलग कर देती है एक एक करके। ऐतिहासिक रूप से कहा जाता है कि बैरम खाँ ने राजा विक्रमादित्य का सर धड़ से अलग कर के काबुल में भिजवा दिया और उसका क्या हुआ धड़ दिल्ली के 1 दरवाजे पर लटका दिया गया। भारतवर्ष के राजा हेमचंद्र विक्रमादित्य की हत्या हुई बैरम खां के द्वारा वहां पर उस राज्य के लोगों ने जो हेमू के समर्थक थे, उन्होंने हेमू नामक स्मारक बनवाए तथा उसकी पूजा भी करते करते हैं।

किसी भी साम्राज्य का सम्राट उसकी योग्यता के अनुसार चयनित होता है ना कि धर्म के आधार पर

हेमचंद्र विक्रमादित्य

पानीपत की पहली लड़ाई और मुगल साम्राज्य का सूर्योदय

मुगल साम्राज्य की स्थापना और लोधी वंश की समाप्ती

वैसे तो भारत के इतिहास में ना जाने कितनी लड़ाइयां दबी हुई हैं लेकिन अगर हम बात करें पानीपत युद्ध की तो यह कुछ लड़ाइयां इतनी भीषण रूप से हुई जिन्होंने इतिहास में नाम दर्ज कर लिया, सभी लड़ाई में अलग-अलग साम्राज्य के सम्राट किसी अन्य साम्राज्य पर अपना वर्चस्व कायम करके अपने अनुसार उस साम्राज्य को चलाना चाहते थे पानीपत की लड़ाई भी कुछ इन्हीं बातों को आपस में जोड़ती है.

12 वीं शताब्दी से लेकर आने वाले कई वर्षों तक पानीपत की लड़ाई हो को देखा गया है इसका असल उद्देश्य माना जाता है कि उत्तर भारत के कार्यकलापों पर अपना वर्चस्व कायम करने के लिए अनेक अनेक सम्राटों ने पानीपत के लिए युद्ध किए।

पानीपत की पहली लड़ाई (First Battle of Panipat) दिल्ली के तख्त व दिल्ली में अपना वर्चस्व कायम करने के लिए दो साम्राज्य के बीच लड़ी गई कहा जाता है कि अगर पानीपत के युद्ध में अगर भारतीय योद्धाओं व राजाओं की हार ना हुई होती तो भारत के भीतर कभी अंग्रेज व ब्रिटिश सरकार कदम कभी रखी नहीं पाते।

पानीपत दिल्ली से लगभग 90 किलोमीटर की दूरी पर माना जाता है, जैसा कि आप जानते हैं पानीपत और महाभारत दोनों एक ही समय के प्रचलित वाक्य हैं, पानीपत का ऐतिहासिक नाम पांडुप्रस्त है। पानीपत का नामकरण माना जाता है कि महाभारत के पांच पांडव के द्वारा ही किया गया था। समय बीतता गया और अब के समय में पांडुप्रस्त को पानीपत के नाम से जाना जाता है।

आइए हम बताते हैं आपको कुछ रोचक तथ्य और वाक्य , पानीपत की लड़ाई के समय हुए थे और हम आपको बताएंगे की पानीपत की लड़ाईयों के असली कारण क्या रहे होंगे और असल में यह लड़ाइयां अपने वर्चस्व के लिए लड़ी गई थी या साम्राज्य को स्थापित करने के लिए।

पानीपत की पहली लड़ाई

21 अप्रैल सन 1526 को पानीपत की पहली लड़ाई हुई, पानीपत की लड़ाई को मुगल साम्राज्य के उद्भव के रूप में देखा जाता है। यह लड़ाई बाबर और इब्राहिम लोदी के बीच लड़ी गई इस लड़ाई के अंदर गन पाउडर व अनेक अनेक हथियारों का भी इस्तेमाल किया गया इस लड़ाई को बहुत ही आधुनिक लड़ाई के रूप में भारतीय इतिहास में देखा जाता है।

बाबर जो कि तैमूर और चंगेज खान के वंशज माने जाते हैं तथा इब्राहिम लोधी अफगान के शासक तथा बहलोल खान के वंशज थे। बाबर ने पहले ही अपना पित्र प्रधान साम्राज्य जो उज्बेकिस्तान कहलाता है तथा समरकंद को भी पानीपत की लड़ाई के दौरान नहीं बचा सके। बाबर ने जैसे-तैसे अपने साम्राज्य को संभाला और काबुल पर अपना वर्चस्व कायम किया कई वर्षों तक उन्होंने काबुल के भीतर ही अपना जीवन व्यतीत किया उस समय उनकी उम्र 43 वर्षा हो चुकी थी।

दिल्ली की ओर विस्तार

बाबर ने अपने साम्राज्य खोने के बाद काफी वर्षों तक संघर्ष किया, तथा उस संघर्ष के दौरान उन्होंने अपना साम्राज्य विस्तार करने का विचार बनाया क्योंकि काबुल में रहते रहते बाबर का साम्राज्य तथा सेना एकजुट और मजबूत बन चुकी थी जिसके कारण बाबर को अब अनुमान हो गया था कि अब मैं अपनी सेना के बल पर किसी और साम्राज्य पर अपना वर्चस्व कायम कर सकता हूं।

बाबर ने दिल्ली की ओर अपना साम्राज्य स्थापित करने की नीतियां बनाई तथा उसके पीछे कारण भी अनेक थे। बाबर भली-भांति जानते थे कि अगर व्यापार की नजर से दिल्ली को देखा जाए तो दिल्ली सबसे बेहतर स्थान उनके लिए साबित होगा क्योंकि दिल्ली भौगोलिक रूप से पश्चिमी तट से जुड़ी हुई है जिससे अनेक साम्राज्य अपने सामानों का आयात निर्यात करते थे।

बाबर की अनुमानित रणनीति इब्राहिम लोदी के खिलाफ

बाबर के पास अपने पूर्व समय में साम्राज्य खोने के पश्चात सैनिकों का अभाव बहुत ही कम रह गया था जिसके कारण बाबर को अनुमान था कि अगर मैं इब्राहिम लोधी से जाकर युद्ध करता हूं तो उसका खामियाजा मुझे भुगतना पड़ सकता है तथा मुझे अपनी बची हुई सेना भी खानी पड़ सकती है। यही सब विचार करने के बाद बाबर ने एक ऐसी रणनीति बनाई जिसने इब्राहिम लोदी की सेना को बुरी तरह से पराजित करके खदेड़ दिया।

इब्राहिम लोदी एक बहुत ही शक्तिशाली सम्राट अपने समय का माना जाता था उसके पास लगभग एक लाख सैनिक तथा 50,000 हाथियों की सेना को मिलाकर अन्य प्रकार के कारतूस,बारूद, तथा और भी हथियार थे लेकिन अगर बाबर की अनुमानित सेना को मापा जाए तो बाबर के पास केवल 15 हज़ार की सैनिकों की एक सीमित सेना थी जिसे लेकर बाबर चिंतित तो था लेकिन उसे थोड़ा समय लगने के बाद उसने एक ऐसी रणनीति बनाई जो इब्राहिम लोदी पर पूरी तरह से हावी हो गई।

बाबर की पहली रणनीति

बाबर को भलीभांति इस बात का ज्ञान था कि इब्राहिम लोदी के पास अनेक प्रकार के हथियार तथा कारतूस और तौप है, जिससे अगर इब्राहिम लोदी उसे पानीपत के मैदान में इस्तेमाल करता है तो , इब्राहिम लोदी अपने जीवन की सबसे बड़ी भूल को अंजाम देगा। बाबर का मानना था जब इब्राहिम लोदी और उसकी सेना पानीपत के मैदान में होगी और जिस वक्त इब्राहिम लोदी के हाथी जो बहुत ही बड़ी संख्या में मैदान में होंगे, उसी समय बाबर और इब्राहिम लोदी की ओर से तोपों का इस्तेमाल किया जाएगा जिससे इब्राहिम लोदी के हाथी अपना आपा खो कर अपनी ही सेना को रोंद डालेंगे। बाबर का अनुभव एकदम सही प्रकार काम आया जैसा बाबर की रणनीति के अनुसार रचा गया था बिल्कुल पानीपत के युद्ध में वैसा ही हुआ इब्राहिम लोदी के हाथियों ने अपना आपा खो कर इब्राहिम लोदी की सेना को ही रौंद डाला जिससे इब्राहिम लोधी को बहुत ही हानि पहुंची ।

बाबर की दूसरी रणनीति

बाबर की पहली रणनीति जो पूरी तरह से सफल हुए इब्राहिम लोधी की सेना को पराजय करने में। इब्राहिम लोदी की सेना को पराजय करने के पश्चात बाबर का मनोबल सातवें आसमान पर पहुंच चुका था उसी समय बाबर ने अपनी दूसरी रणनीति को अंजाम दिया। दूसरी रणनीति के भीतर बाबर ने मैदान में इब्राहिम लोदी की सेना के रास्तों में बड़े-बड़े गड्ढे खुदवा कर उन्हें ढकवा दिया, जैसे ही इब्राहिम लोदी की सेना आगे बढ़ी हथियार वह अपने हाथियों के साथ सब के सब उन खुदे हुए गड्ढों में जाकर दफन हो गए तथा जो सेना पीछे से आ रही थी उसे इस बात का अनुमान ही नहीं हुआ कि उनके साथ हो क्या रहा था मैदान के अंदर इससे पहले उन्हें समझ आता उतने में ही बाबर की सेना ने उन्हें चारों ओर से घेरकर उनके सर कलम कर दिए, बाबर के द्वारा बनाई गई दूसरी रणनीति भी पूरी तरह सफल रही।

तुलुगामा और अराबा रणनीति

बाबर की इस रणनीति के भीतर सेना को दाएं और बाएं में विभाजित करके एक ऐसी रणनीति बनाई बीच के जब इब्राहिम लोदी की सेना खुदे हुए गड्ढों में जाकर गिरी तो बाबर की सेना ने तुलुगामा रणनीति अपनाकर उस इब्राहिम लोधी की सेना का वध किया। इस रणनीति के भीतर दाएं बाएं और केंद्र बिंदु निश्चित करके दुश्मन की सेना को फंसाकर मारा जाता था।

तुलुगामा और अराबा रणनीति के रचीयता बाबर को ही माना जाता है ऐतिहासिक रूप में। दोनों रणनीतियों में दुश्मन की सेना को इस प्रकार फंसा लिया जाता था कि दुश्मन की सेना के पास कोई भी दूसरा रास्ता नहीं बचता था, तथा इन रणनीतियों में दुश्मन को दाएं और तथा बाएं ओर से घेरकर मारा जाता था तथा जो बच जाते थे उन्हें केंद्र की ओर से हमला करके उनका वध किया जाता था।

हुमायूं का अनुभव पानीपत की लड़ाई में

पानीपत की पहली लड़ाई में बाबर का पुत्र हुमायूं भी शामिल था जिसने इब्राहिम लोदी के सेना को इस प्रकार निरस्त कर दिया तथा इब्राहिम लोदी की सेना के पास अपने प्राण त्यागने के अलावा और कोई भी चारा नहीं बचा था। इब्राहिम लोदी की इतने विशाल सेना भी बाबर और हुमायूं के सामने ना टिक सकी , और युद्ध के दौरान भाइयों ने तुलुगामा और अराबा रणनीति के अनुसार ही अपने पिता बाबर का साथ दिया जो गड्ढे रणनीतियों के अनुसार खोदे गए थे हुमायूं दाएं तथा बाएं ओर से इब्राहिम लोदी की सेना का वध कर रहे थे तथा बाबर केंद्र से एक विशाल हाथी पर बैठकर अपनी सेना का मनोबल बढ़ा रहे थे तथा इब्राहिम लोदी की सेना को पराजित होते देख रहे थे।

बाबर और इब्राहिम लोदी के बीच युद्ध

जैसे-जैसे इब्राहिम की विशाल सेना बाबर और हुमायूं के आगे कमजोर पड़ती दिख रही थी उसी समय इब्राहिम लोदी को इस बात की जानकारी मिली तथा लोधी ने अपना आपा खो कर सीधा हाथियों और अपनी बची हुई सेना के साथ मैदान में पहुंच गया लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी क्योंकि बाबर की सेना ने इब्राहिम लोदी की सेना को इस प्रकार पराजित कर दिया था कि अब इब्राहिम लोदी के पास कोई भी उम्मीद नहीं बची थी।

माना जाता है कि उसी युद्ध के दौरान जब इब्राहिम लोदी ने मैदान में कदम रखा उसके थोड़ी देर बाद ही बाबर ने इब्राहिम लोदी का सर कलम कर दिया था। बाबर ने इब्राहिम लोदी के सैनिकों के सर कलम करवा कर एक 35 फुट ऊंची दीवार बनवा दी जो इस बात का प्रतीक है कि अब केवल बाबर का वर्चस्व भारतवर्ष के ऊपर कायम हो गया था। पानीपत की पहली लड़ाई को क्रूरता की मिसाल के तौर पर भी जाना जाता है।

इब्राहिम लोधी की हत्या के बाद बाबर का वर्चस्व हिंदुस्तान पर कायम हो गया था तथा बाबर और हुमायूं इतने क्रूर सम्राट माने जाते थे कि जो सेना इब्राहिम लोदी की युद्ध के दौरान बच गई थी हुमायूं और बाबर ने उनके भी एक-एक कर सबके सर कलम करवा दिए और अपने मुगल साम्राज्य की स्थापना भारतवर्ष के भीतर की।

ऐतिहासिक रूप से बाबर को क्रूरता का दूसरा नाम दिया गया था

युद्ध में विजय पाने की पहली चाबी समझदारी और साहस होता है

महाराणा प्रताप और अकबर के बीच हल्दीघाटी युद्ध

हल्दीघाटी का युद्ध किन दो शासकों के बीच लड़ा गया और इसके पीछे क्या कारण रहे थे

चार दिन का हल्दीघाटी का युद्ध जलालुद्दीन मोहम्मद अकबर और मेवाड़ के राजा महाराणा प्रताप के बीच लड़ा गया था, लेकिन ऐसी क्या वजह थी कि अकबर मेवाड़ के ऊपर अपना शासन जमाना चाहता था तथा उस पर कब्जा करना चाहता था, हल्दीघाटी का युद्ध मुगलों और राजपूतों के बीच लड़ा गया था जिसमें कई लाख सैनिक मारे गए थे और हानि दोनों ओर से बराबर हुई थी।

हल्दीघाटी के युद्ध का कुछ अलग इतिहास है माना जाता है 442 साल में हल्दीघाटी की जमीन पर अनेक प्रकार के युद्ध हुए हैं अनेक प्रकार के शासकों के बीच लेकिन आज तक यह साफ नहीं हो पाया कि हल्दीघाटी युद्ध का असली कारण आज तक किसी के सामने नहीं आ पाया।

महाराणा प्रताप और मोहम्मद जलालुद्दीन अकबर के बीच क्या मतभेद थे

वैसे तो जाना जाता है कि जलालुद्दीन अकबर महाराणा प्रताप से बहुत ही डरता था और उनसे युद्ध करने का साहस कभी नहीं करता था क्योंकि अकबर को इस बात का अनुमान पहले से ही था कि अगर मैं महाराणा प्रताप से युद्ध करता हूं तो मैं निश्चय ही पराजित हो जाऊंगा और अपना साम्राज्य खो दूंगा, अकबर के पास 80000 सैनिक तथा हजारों हाथियों की सेना, तोप,अनुभवी घुड़सवार और अन्य प्रकार के ऐसे हथियार थे।

जलालुद्दीन अकबर मेवाड़ के ऊपर अपना शासन क्यों कायम करना चाहता था, उसके पीछे अनेक कारण थे जलालुद्दीन अकबर को पता था कि राजनीतिक और भौगोलिक रूप से अगर  अकबर को अपना व्यापार हिंदुस्तान के भीतर  जमाना था तो उसे मेवाड़ के भीतर अपना शासन कायम करना ही पड़ेगा, क्योंकि मेवाड़,गंगा से होने वाले व्यापार को पश्चिमी तट से जोड़ता था तथा पश्चिमी साम्राज्य के देशों से आयात निर्यात करना था तो अकबर को मेवाड़ के अंदर अपने कदम जमाने अनिवार्य हो चुके थे।

अकबर के द्वारा महाराणा प्रताप को भेजा गया संधि प्रस्ताव

अकबर के अनेक प्रयासों के बाद भी महाराणा प्रताप अपनी बात से बिल्कुल भी नहीं डगमगाए तथा उन्होंने अकबर को साफ शब्दों में मना कर दिया कि अगर वह मेवाड़ के ऊपर कब्जा करने का मन बनाता है तो वहां उसकी जीवन की सबसे बड़ी भूल और उसे अपने प्राण तक त्यागने पढ़ सकते हैं, इस सब बातों को सुनकर अकबर एक बार को डर गया लेकिन उसने बाकी हिंदू राजाओ का सहारा लिया संधि प्रस्ताव को लेकर ।

अकबर ने राजा मानसिंह, टोडरमल, तथा भगवान दास को अपना संदीप प्रस्ताव लेकर महाराणा प्रताप के पास भेजा, लेकिन महाराणा प्रताप ने सभी प्रस्ताव को खारिज करते हुए मेवाड़ राज्य छोड़ने से मना कर दिया.  अकबर ने अपने जीवन में महाराणा प्रताप को 8 से 9 बार संधि प्रस्ताव भेजें लेकिन अकबर की सारे प्रयास विफल होते जा रहे थे।

महाराणा प्रताप जो राजपूतों से ताल्लुक रखते थे तथा उनके वंशज थे उन्होंने कभी झुकना नहीं सीखा था वह अपने प्राण तो त्याग सकते थे लेकिन अपने मेवाड़ का शासक किसी मुगल के हाथों नहीं दे सकते थे, अकबर ने एक समय महाराणा प्रताप को ऐसा प्रस्ताव भेजा जिसके भीतर यह कहा गया कि आप “मुझे मेवाड़ का शासक दे दीजिए बदले में आधा हिंदुस्तान आपका होगा” महाराणा प्रताप ने बहुत सोच विचार कर बाद इस प्रस्ताव को भी ठुकरा दिया।

अकबर और उदय सिंह

महाराणा प्रताप के पिता जी उदय सिंह भी अपनी वीरता और महानता के लिए मशहूर थे तथा अपने साम्राज्य में उनका एक अलग ही तरह का वर्चस्व था, पानीपत की पहली लड़ाई साल 1526 के दौरान बाबर हिंदुस्तान की जमीन पर कदम रख चुका था लेकिन उसे इस बात का पूर्ण तरह ज्ञात था कि उसे सबसे ज्यादा खतरा चित्तौड़ और मेवाड़ के राजा राणा संगा जोकि महाराणा प्रताप के दादाजी थे।

राणा सांगा एक बहुत ही महान वीर माने जाते थे जिसके सामने इब्राहिम लोधी ने भी घुटने टेक दिए थे, समय बीतता गया और एक दिन ऐसा आया जब राणा सांगा की सेना और बाबर की सेना आपस में आ मिली और अनेक कारणों से तथा कम सेनाओं के अभाव से राणा सांगा बाबर से पराजय हो गए।

राणा सांगा के जाने के बाद बाबर के पोते जलालुद्दीन अकबर ने राणा सांगा के पुत्र उदय सिंह जोकि चित्तौड़ के राजा उस समय थे अकबर ने उनके ऊपर आक्रमण करके उनसे चित्तौड़ का शासन छीन लिया तथा अपना साम्राज्य उसके ऊपर स्थापित कर दिया. चित्तौड़ से पराजय होने के बाद उदय सिंह अपना पलायन करके उदयपुर आकर बस गए, उदयपुर पहाड़ी क्षेत्र था जिसमें भीलो की संख्या अधिक थी उदय सिंह ने उन्हीं के बीच अपना बाकी जीवन बिताया तथा महाराणा प्रताप का जन्म भी उन भीलो के बीच उदयपुर में ही हुआ।

कौन थे महाराणा प्रताप

उदय सिंह और जयवंता बाई के पुत्र, जो भीलो के बीच अपना पूरा जीवन व्यतीत कर रहे थे तथा भीलो के राजाओं के साथ वह अपना शक्ति प्रदर्शन करते थे और उनसे प्रशिक्षण लिया करते थे, उदय सिंह ने उदयपुर में ही अपना आसन जमाया और वहीं पर महाराणा प्रताप का जन्म हुआ, लेकिन एक यह सबसे बड़ी विडंबना थी कि उदय सिंह की दूसरी पत्नी चाहती थी कि उनका पुत्र जगमल उदयपुर की राजगद्दी को संभाले तथा अपने साम्राज्य का सम्राट बने, ऐसा हो भी गया जगमल को उदयपुर की राजगद्दी मिल गई लेकिन उन्होंने उसका दुरुपयोग करके उदयपुर की जनता पर जुल्म ढाने शुरू कर दिए।

जगमल सिंह का शासन कुछ अनैतिक माना जा रहा था तो उदयपुर के सरदारों ने मिलकर जगमल सिंह को राजगद्दी से हटाने का का फैसला लिया, जगमल सिंह को गद्दी से हटाने का यह कारण भी था कि उसके मन के भीतर बहुत ही घमंड और जगमल सिंह डरपोक किस्म का राजा था, इन्हीं सब कारणों के चलते जगमल सिंह को गद्दी से हटाकर महाराणा प्रताप को उदयपुर का सम्राट घोषित कर दिया गया।

अकबर और जगमल सिंह, शक्ति सिंह का षड्यंत्र महाराणा प्रताप के विरुद्ध

जिस समय महाराणा प्रताप का राज्याभिषेक उदयपुर में हुआ तो यह बात महाराणा प्रताप के दो सौतेले भाइयों को खटक रही थी जिसमें शक्ति सिंह तथा जगमल सिंह शामिल थे, जलालुद्दीन अकबर ने उसी समय का लाभ उठाकर महाराणा प्रताप के दोनों सौतेले भाइयों से संधि प्रस्ताव करके उनके दोनों भाइयों को अपने साथ शामिल कर लिया और महाराणा प्रताप को पराजित करने का षड्यंत्र रचा।

महाराणा प्रताप को जब इस बात का पता चला कि उनके दोनों सौतेले भाई अकबर के साथ जा चुके हैं और मुझे हराने का षड्यंत्र रच रहे हैं तो महाराणा प्रताप को इस बात का बहुत ही दुख हुआ, दुख होना अनिवार्य भी था क्योंकि अब महाराणा प्रताप बिल्कुल अकेले पड़ चुके थे. महाराणा प्रताप ने फिर भी हार नहीं मानी उनकी वीरता और साहस इतना मजबूत था।

अकबर से युद्ध करने का निश्चय कर लिया और अपने साम्राज्य के भीलो के साथ मिलकर अपनी एक सेना तैयार की, भीलो और महाराणा प्रताप के बीच बहुत ही गहरे संबंध थे क्योंकि कुछ वर्ष पूर्व उदय सिंह जब उदयपुर में आकर अपना जीवन व्यतीत कर रहे थे तो भीलो ने ही उनकी सबसे ज्यादा सहायता की थी,सभी भील महाराणा प्रताप के वफादार थे तथा वह एक महाराणा प्रताप के लिए अपने प्राण त्याग सकते थे।

हल्दीघाटी युद्ध का आरंभ

साल 1576 आखिर वह समय आ ही गया था जब हल्दीघाटी का युद्ध अपनी चरम पर था, तथा दो महान सम्राट एक और जलालुद्दीन अकबर बाबर के पोते तथा दूसरी ओर राणा सांगा के पोते महाराणा प्रताप, जलालुद्दीन अकबर ने मानसिंह को 80000 सैनिकों के साथ तथा अनुभवी घुड़सवार को इकट्ठा करके मेवाड़ पर आक्रमण करने का आदेश दिया, लेकिन महाराणा प्रताप इस बात से परिचित थे कि अगर अकबर की सेना हल्दीघाटी की ओर अपने कदम बढ़ाएगी तो उसे पहले अरावली पर्वतों को पार करना होगा।

अरावली पर्वतों के बीच का स्थान पूरी तरह जंगल से भरा हुआ था चारों और बड़े-बड़े जंगल तथा पेड़ पौधे और पहाड़ थे, महाराणा प्रताप ने  भीलो के साथ मिलकर योजना बनाई तथा अपने अपने कुछ चंद सैनिकों के साथ मिलकर महाराणा प्रताप ने अकबर की महान सेना का सामना किया।

18 जून साल 1576, अकबर की महान सेना अरावली पर्वतों की और बड़ी उसी दौरान भील समुदाय ने अकबर की सेना को चारों उसे घेरकर उन पर छापामार और द्वीप कंटक नीति से अकबर की सेना को लहूलुहान कर दिया तथा मानसिंह को समझ नहीं आ रहा था कि उसकी सेना के साथ हो क्या रहा है। केवल 400 भील समुदाय के लोगों ने अकबर की सेना के 10,000 सैनिकों का वध कर दिया।

हल्दीघाटी की जमीन पर पहुंचने के दौरान महाराणा प्रताप की सेना की संख्या केवल 20000 थी और जलालुद्दीन अकबर की सेना लगभग 4 गुना महाराणा प्रताप की सेना से, अकबर की सेना के पास अनुभवी घुड़सवार तथा अनेक प्रकार के विशाल हथियार थे जिसका सामना भील समुदाय और महाराणा प्रताप की सेना ने जमकर सामना किया. महाराणा प्रताप की सेना की विशेषता यह थी कि उनके भीतर एक जबरदस्त आत्मविश्वास था उनका हर एक सैनिक अकेला अकबर के 10 सैनिकों के बराबर था।

महाराणा प्रताप और बहलोल खान, मानसिंह

हल्दीघाटी का युद्ध चल ही रहा था जिसमें महाराणा प्रताप की सेना जबरदस्त तौर तरीके अपनाकर मुगल साम्राज्य की सेना की छाती को चीर रही थी अपनी तीरंदाजी से, तथा महाराणा प्रताप की सेना इतनी मजबूत किस्म की बनी हुई थी कि वह अकबर की महान सेना का सामना बहुत ही डटकर कर रही थी हर एक सैनिक अपने प्राण की चिंता ना करते हुए अकबर की सेना का वध कर रहा था।

जलालुद्दीन अकबर का सबसे महत्वपूर्ण सेनापति बहलोल खान उसी दौरान महाराणा प्रताप के ऊपर हमला करता है , और दोनों के बीच जबरदस्त लड़ाई चलती है बहलोल खान का कद एक हाथी के समान माना जाता था,महाराणा प्रताप ने अपनी जबरदस्त प्रशिक्षण से बहलोल खान के दो हिस्से कर दिए तथा मानसिंह को भी पराजित कर दिया. अकबर के बेटे सलीम ने भी हल्दीघाटी युद्ध में हिस्सा लिया तथा एक क्षण ऐसा आया कि महाराणा प्रताप और सलीम आमने-सामने हो गए महाराणा प्रताप ने हाथी पर बैठे सलीम के सामने कदम रखा तथा अपना दाया पैर हाथी के सर पर रखकर सलीम की गर्दन पर तलवार तान दी, थोड़े बहुत प्रयास कर सलीम ने अपनी जान बचाई और वहां से भाग गया।

महाराणा प्रताप का रामप्रसाद हाथी 

महाराणा प्रताप और उनके जानवरों के बीच बहुत ही गहरा संबंध था वह अपने चेतक और रामप्रसाद को अपनी संतान से ज्यादा प्यार करते थे यही कारण था कि सभी जानवर महाराणा प्रताप के इतने वफादार थे कि अगर महाराणा प्रताप जैसे कह दे वह बिल्कुल वैसे ही किया करते थे।

हल्दीघाटी युद्ध के दौरान चेतक की मृत्यु के बाद अकबर के सैनिकों ने 10 हाथियों की मदद लेकर रामप्रसाद को अगवा कर लिया था, तथा अकबर के सामने पेश किया अकबर ने उस हाथी को बंदी बना लिया, लेकिन रामप्रसाद जो कि महाराणा प्रताप का वफादार हाथी था उसने अकबर के महल में 28 दिनों तक किसी भी प्रकार का भोजन तथा पानी नहीं खाया पिया जिसके कारण राम प्रसाद की मृत्यु हो गई। राम प्रसाद की मृत्यु के बाद यह संदेश अकबर तक पहुंचा, तो अकबर को इस बात का ज्ञात हो चुका था कि अगर महाराणा प्रताप का हाथी ही मेरे सामेन नहीं झुका तो महाराणा प्रताप को तो झुकाने का सवाल ही पैदा नहीं होता.

महाराणा प्रताप और चेतक

महाराणा प्रताप के पास उनका घोड़ा चेतक बहुत ही अनुभवी और समझदार माना जाता था हल्दीघाटी युद्ध के दौरान चेतक ने कई बार महाराणा प्रताप के प्राण बचाए, चेतक ने ऊंची ऊंची छलांग लगाकर तथा अपनी तेज गति से महाराणा प्रताप को हल्दीघाटी युद्ध में सफलताएं दिलाई तथा अनेक अकबर के सैनिकों का वध करवाया।

हल्दीघाटी युद्ध के भीतर हाथियों का भी अनेक स्थान था अकबर के पास 20,000 से एक हाथी था जो उस समय इस प्रकार तैयार किए जाते थे कि उन हाथियों की सूंड में तलवारे रखी जाती थी, जब महाराणा प्रताप चेतक के ऊपर बैठकर हल्दीघाटी युद्ध में अकबर के सैनिकों का वध कर रहे थे उसी दौरान चेतक ने एक ऊंची छलांग लगाई तथा हाथी की सूंड में रखी हुई तलवार चेतक के सीधा पैर पर लगी और चेतक का एक पैर कट गया लेकिन एक पैर कट जाने के बाद भी चेतक ने महाराणा प्रताप का साथ नहीं छोड़ा।  

एक स्थिति ऐसी आई जब महाराणा प्रताप को अकबर की सेना ने चारों ओर से बंदी बना लिया, उसी दौरान चेतक ने अपना कमाल दिखाते हुए महाराणा प्रताप को तेज रफ्तार से दौड़ लगाते हुए 28  फीट चोडे नाले को कूदकर चेतक ने महाराणा प्रताप के प्राण बचाए तथा उसी दौरान चेतक ने अपने प्राण त्याग दिए। चेतक की वफादारी केवल अपने महाराणा प्रताप के लिए ही थी उसने अपने प्राणों की चिंता ना करते हुए महाराणा प्रताप को विकट परिस्थिति से निकालकर एक सुरक्षित स्थान पर लाकर खड़ा कर दिया।  

हल्दीघाटी युद्ध का समापन

युद्ध के बाद मुगलों ने चित्तौड़ गोकुंडा कुंभलगढ़ और उदयपुर पर कब्जा कर लिया मगर प्रताप को नहीं हरा पाए जान लेना तो दूर की बात थी सारे राजपूत राजा मुगलों के अधीन हो हो गए लेकिन महाराणा प्रताप कभी नहीं हुए.हल्दीघाटी युद्ध का समापन होने के बाद भी महाराणा प्रताप ने मुगलों के साथ अनेक युद्ध लड़े और कभी पराजय नहीं हुए. हल्दीघाटी की के युद्ध के बाद महाराणा प्रताप भील समुदाय के लोगों के साथ जाकर बस चुके थे और वहीं पर अपना जीवन व्यतीत कर रहे थे उनका मानना था कि अगर मैं अपना साम्राज्य नहीं बचा पाया तो कोई बात नहीं लेकिन मैं कभी किसी दूसरे सम्राट के आगे अपना सर नहीं चुका पाऊंगा.

भीगी आंखों से अकबर के लफ्ज़ महाराणा प्रताप के लिए

एक रोज महाराणा प्रताप शेर का शिकार करते हुए गंभीर रूप से घायल हो गए लंबे समय तक उनका इलाज भील समुदाय के द्वारा चलता रहा लेकिन अब समय आ चुका था कि एक महान वीर इंसान को अपने प्राण त्यागने ही थे, गंभीर रूप से घायल होने के बाद महाराणा प्रताप का देहांत हो गया.

महाराणा प्रताप के देहांत के पश्चात यह सूचना जब अकबर तक जा पहुंची तो अकबर एक ऐसा सम्राट था जो अपने विरोधी तथा दुश्मन का भी सम्मान करता था उसने एक चिट्ठी लिखी महाराणा प्रताप के लिए उसमें यह लिखा गया कि महाराणा प्रताप जैसा इंसान आने वाले समय में पैदा होना मुश्किल है तथा इतना वीर इंसान जिसने अपने प्राणों का त्याग कर दिया लेकिन अपना सर नहीं झुकाया।

महाराणा प्रताप की मृत्यु का बेहद अफसोस है और मैं जिंदगी भर इस बात से निराश रहूंगा कि मैं महाराणा प्रताप को हल्दीघाटी युद्ध में तथा अनेक युद्ध में पराजित नहीं कर पाया।

अकबर